राज्यसभा में कमल हासन के पहले भाषण में चुनाव आयोग, ‘लिविंग डेड वोटर्स’, तमिल अस्मिता और मोदी सरकार पर तीखे सवाल। पढ़िए पूरा विश्लेषण।
Author - भाषा सिंह
1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य कर चुकी हैं। मैला ढोने जैसी अमानवीय प्रथा पर गहन काम किया है।
दलितों, अल्पसंख्यकों, लैंगिक मुद्दों और अन्य हाशिए के समुदायों पर लेखन के लिए जानी जाती हैं।
2005 में प्रभा दत्त संस्कृति फ़ेलोशिप से सम्मानित हुईं। 2007 में रामनाथ गोयनका पुरस्कार
(प्रिंट, हिंदी) से वर्ष की सर्वश्रेष्ठ पत्रकार के रूप में सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें
एनएफ़आई फ़ेलोशिप, पैनोस फ़ेलोशिप और परी फ़ेलोशिप भी प्राप्त हुई हैं।
दो पुस्तकों की लेखिका हैं – अनसीन (अदृश्य भारत) और शाहीन बाग: लोकतंत्र की नई करवट।
असम, राजस्थान और गुजरात में वोटर लिस्ट की ‘शुद्धि’ के नाम पर मुसलमानों के नाम काटने के खुलासे। BLO सुमोना रहमान की साहसी गवाही।
PM मोदी ने केरल को ‘गुजरात मॉडल’ पर चलाने की बात कही। लेकिन नीति आयोग के आंकड़े बताते हैं कि HDI, शिक्षा, स्वास्थ्य में केरल गुजरात से बहुत आगे है।
दिल्ली के बुराड़ी में माउंट ऑलिवेट स्कूल के बाहर “स्कूल नहीं, गौशाला चाहिए” के नारे। शिक्षा संस्थानों पर बढ़ते हमलों और नफरत की राजनीति का विश्लेषण।
मुरादाबाद में ‘ऑनर किलिंग’: काजल सैनी और अरमान की हत्या उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से आई एक खबर 2026 के भारत की एक भयावह झलक पेश करती है। तीन भाइयों ने मिलकर अपनी ही बहन...
ट्रम्प के ‘Board of Peace’ की घोषणा, ग्रीनलैंड पर नजर, गाज़ा का नाम गायब और एक अरब डॉलर की मेंबरशिप—क्या यह शांति है या तानाशाही?
तथाकथित बाबाओं के बढ़ते प्रभाव से हिंदू समाज में अंधविश्वास और स्त्री-विरोधी सोच कैसे फैल रही है, ग्राउंड रिपोर्ट और विश्लेषण।
यूपी सरकार और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के बीच टकराव ने ‘सनातन बनाम सनातन’ की बहस को जन्म दिया है। सवाल अब धार्मिक नहीं, संवैधानिक और राजनीतिक है।
ढेंकनाल, उड़ीसा में एक पादरी के साथ बजरंग दल से जुड़े लोगों द्वारा की गई बर्बरता ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानिए...
कश्मीर में सीनियर पत्रकारों को बॉन्ड साइन कराने की कोशिश, पुलिस की हैरेसमेंट और मीडिया संस्थानों की चुप्पी पर सवाल।
