हिंदू राष्ट्र बनाने, मुसलमानों के खिलाफ़ बोलने वाली संस्था के कार्यक्रम में सरकार ने दिए 63 लाख
देश की राजधानी नई दिल्ली के प्रतिष्ठित कन्वेंशन स्थल भारत मंडपम में दिसंबर 2025 में आयोजित एक कार्यक्रम को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। आरोप है कि सनातन संस्था के इस आयोजन के लिए केंद्र सरकार ने जनता के टैक्स के पैसे से वित्तीय सहायता दी, जबकि कार्यक्रम के दौरान कथित तौर पर घृणा फैलाने वाले बयान दिए गए।
सूचना के अधिकार (RTI) के जरिए सामने आई जानकारी के अनुसार, इस आयोजन पर लगभग 63 लाख रुपये खर्च किए गए। यह राशि सरकारी स्रोतों से प्रदान की गई थी, जिससे यह बहस तेज हो गई है कि क्या सार्वजनिक धन का उपयोग विभाजनकारी और घृणास्पद विमर्श के लिए किया जाना चाहिए।
क्या कहा गया कार्यक्रम में?
13-14 दिसंबर 2025 को आयोजित इस कार्यक्रम में कुछ वक्ताओं द्वारा कथित रूप से ऐसे बयान दिए गए जिनमें—
- देश के लगभग 25% मुस्लिम आबादी को बाहर करने जैसी बातें कही गईं,
- यह दावा किया गया कि “सरकारी दबाव हो तो बचे हुए मुसलमान हिंदू धर्म अपना लेंगे”,
- आर्थिक बहिष्कार (इकनॉमिक बॉयकॉट) की अपील भी की गई।
यदि ये दावे सही हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या सरकारी संसाधनों का उपयोग सामाजिक विभाजन और नफरत को बढ़ाने वाले मंचों के लिए किया जा सकता है?
राजनीतिक मौजूदगी भी चर्चा में
इस कार्यक्रम में विभिन्न राजनीतिक हस्तियों की उपस्थिति भी विवाद का विषय बनी। दिल्ली सरकार के पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा के शामिल होने की बात सामने आई है। इसके अलावा, केंद्र सरकार के कुछ मंत्रियों की भागीदारी की भी जानकारी दी जा रही है।
इससे यह बहस और गहरी हो जाती है कि क्या यह केवल एक निजी धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम था, या इसे सरकारी संरक्षण प्राप्त था।
विरोधाभास: उसी स्थल पर वैश्विक एआई सम्मेलन
दिलचस्प और विडंबनापूर्ण तथ्य यह है कि जब यह मामला सार्वजनिक चर्चा में आया, उसी समय भारत मंडपम में एक अंतरराष्ट्रीय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सम्मेलन आयोजित हो रहा था, जिसमें दुनिया भर के विशेषज्ञ भाग ले रहे थे।
यह स्थिति एक बड़ा प्रश्न खड़ा करती है—
एक ओर भारत वैश्विक स्तर पर तकनीकी नेतृत्व और समावेशिता का संदेश देना चाहता है, वहीं दूसरी ओर उसी स्थल पर आयोजित कार्यक्रमों में नफरत भरे भाषणों के आरोप सामने आते हैं।
बड़ा सवाल: सार्वजनिक धन और जवाबदेही
यह मामला केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। यह व्यापक प्रश्न उठाता है:
- क्या जनता के टैक्स का पैसा सामाजिक ध्रुवीकरण में इस्तेमाल हो रहा है?
- ऐसे आयोजनों की स्क्रीनिंग और जवाबदेही कौन तय करता है?
- क्या सरकारी सहायता के लिए कोई नैतिक या संवैधानिक मानक लागू हैं?
यदि सार्वजनिक संसाधन नफरत फैलाने वाले विमर्श में लगाए जा रहे हैं, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक सद्भाव—दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
