पश्चिम बंगाल में RSS की बढ़ती पकड़: क्या चुनाव में BJP को मिलेगा फायदा?
पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल बन चुका है। ऐसे समय में एक बड़ा सवाल यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का राज्य में कितना प्रभाव है और यह भारतीय जनता पार्टी (BJP) को कितना राजनीतिक फायदा पहुंचा सकता है।
अगर इतिहास पर नज़र डालें, तो RSS ने बंगाल में अपना काम 1930 के दशक में कोलकाता से शुरू किया। 1949 में यहां पहली शाखा स्थापित हुई। लेकिन शुरुआती दशकों में इसका विस्तार बेहद धीमी गति से हुआ। इसकी सबसे बड़ी वजह थी बंगाल की सामाजिक-राजनीतिक संस्कृति, जहां वामपंथी विचारधारा का गहरा प्रभाव रहा।
करीब 34 वर्षों तक वामपंथी सरकार के शासन के दौरान RSS का प्रभाव सीमित ही रहा। दरअसल, संघ का काम शाखाओं के माध्यम से संगठन विस्तार और विचारधारा फैलाने पर आधारित होता है, लेकिन उस दौर में इसकी गतिविधियां दबकर रह गईं।
2011 के बाद बदलाव की शुरुआत
2011 के बाद, जब पश्चिम बंगाल की राजनीति में बदलाव आया, RSS ने राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करने की नई रणनीति अपनाई। इस रणनीति का केंद्र था—शाखाओं का विस्तार।
पहले जहां शाखाओं की संख्या लगभग 2,000 बताई जाती थी, वहीं कुछ साल पहले यह बढ़कर 6,000 तक पहुंच गई और अब यह संख्या करीब 12,000 तक बताई जा रही है। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि संघ ने जमीनी स्तर पर अपनी मौजूदगी को तेज़ी से बढ़ाया है।
सांस्कृतिक और धार्मिक रणनीति
RSS ने बंगाल में अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए सांस्कृतिक और धार्मिक रणनीति अपनाई।
जहां पहले दुर्गा पूजा जैसे पारंपरिक त्योहारों का दबदबा था, वहीं अब रामनवमी, हनुमान जयंती और कृष्ण जन्माष्टमी जैसे आयोजनों को बड़े पैमाने पर मनाया जाने लगा।
यह बदलाव केवल धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि इसके जरिए समाज के एक वर्ग के साथ वैचारिक जुड़ाव बनाने की कोशिश भी थी।
राजनीतिक समन्वय और सक्रियता
हाल के वर्षों में RSS ने BJP के साथ अपने समन्वय को और मजबूत किया है। संघ के प्रचारकों के साथ-साथ सरसंघचालक Mohan Bhagwat ने भी पश्चिम बंगाल के दौरे किए और संगठनात्मक बैठकों के जरिए BJP को मजबूत करने की रणनीति पर काम किया।
मार्च में आयोजित RSS की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में भी यह स्पष्ट संकेत दिया गया कि संघ के सभी सहयोगी संगठन पश्चिम बंगाल में BJP की मदद के लिए और अधिक सक्रिय होंगे।
ध्रुवीकरण की राजनीति
RSS और उससे जुड़े संगठनों ने जिन मुद्दों को प्रमुखता दी, उनमें धार्मिक पहचान और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण शामिल हैं।
- पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 30% है
- “घुसपैठ” का मुद्दा बार-बार उठाया गया
- बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति, खासकर Sheikh Hasina के सत्ता से हटने के बाद, वहां हिंदुओं पर हमलों के मामलों को प्रचारित किया गया
इन मुद्दों के जरिए यह नैरेटिव बनाया गया कि हिंदू समुदाय खतरे में है। इसका असर यह हुआ कि बंगाल जैसे राज्य, जहां पहले साम्प्रदायिक तनाव अपेक्षाकृत कम था, वहां पिछले 15–20 वर्षों में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज़ हुई है।
बदलती रणनीति, मजबूत होता आधार
RSS ने पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में, जहां उसका पारंपरिक वैचारिक आधार कमजोर था, अपनी रणनीति को बदला और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाला।
- शाखाओं का तेजी से विस्तार
- सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए जुड़ाव
- राजनीतिक समन्वय
- और पहचान आधारित मुद्दों को उभारना
इन सभी तरीकों ने मिलकर RSS को बंगाल में एक मजबूत संगठनात्मक ताकत बना दिया है।
निष्कर्ष
आज पश्चिम बंगाल में RSS लगभग 12,000 शाखाओं के साथ एक प्रभावशाली नेटवर्क खड़ा कर चुका है। यह नेटवर्क BJP के लिए एक मजबूत आधार तैयार करता है, जो चुनावी राजनीति में उसे फायदा पहुंचा सकता है।
हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण सवाल है कि इस प्रक्रिया का राज्य की सामाजिक संरचना और साम्प्रदायिक सौहार्द पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
