April 19, 2026 2:00 am
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कैसे गढ़ा गया ‘लव जिहाद’ का नैरेटिव

TCS नासिक मामले में नए खुलासों ने ‘लव जिहाद’ के दावों की पोल खोल दी। जानिए कैसे एक कार्यस्थल उत्पीड़न केस को सांप्रदायिक नैरेटिव में बदला गया।

TCS नासिक मामले में गोदी मीडिया की भूमिका पर सवाल

महाराष्ट्र के नासिक में स्थित Tata Consultancy Services (TCS) के एक कथित कार्यस्थल उत्पीड़न मामले ने जिस तरह से राष्ट्रीय बहस का रूप लिया, वह केवल एक कानूनी या कॉर्पोरेट मुद्दा नहीं रह गया। यह मामला इस बात का उदाहरण बन गया कि किस तरह बिना ठोस सबूत के एक सामान्य शिकायत को “लव जिहाद” और “धर्मांतरण साज़िश” जैसे बड़े और संवेदनशील नैरेटिव में बदल दिया जाता है।

क्या है पूरा मामला?

मार्च 2026 के अंत में TCS नासिक की एक महिला कर्मचारी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। आरोप थे:

  • पीछा करना (Stalking)
  • मानसिक दबाव
  • कार्यस्थल पर उत्पीड़न

इसके बाद धीरे-धीरे अन्य महिला कर्मचारी भी सामने आईं और कुल मिलाकर लगभग 9 एफआईआर दर्ज होने की बात सामने आई। पुलिस ने जांच के लिए SIT (Special Investigation Team) गठित की और कुछ आरोपियों को गिरफ्तार भी किया।

मूल रूप से ये मामला कार्यस्थल पर उत्पीड़न (Workplace Harassment) का था, जिसमें आरोप था कि कुछ सहकर्मी और वरिष्ठ कर्मचारी अपने पद का दुरुपयोग कर महिलाओं पर दबाव बना रहे थे। साथ ही HR विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठे कि शिकायतों को समय पर और गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया।

मामले को ‘लव जिहाद’ में कैसे बदला गया?

जैसे ही यह मामला मीडिया और सोशल मीडिया पर आया, कुछ चैनलों और प्लेटफॉर्म्स ने इसे संगठित “धर्मांतरण रैकेट” और “लव जिहाद” से जोड़ना शुरू कर दिया।

  • ईद मुबारक के वीडियो तक को साज़िश से जोड़ दिया गया
  • बिना पुष्टि के मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया गया
  • पूरे मामले को सांप्रदायिक रंग दे दिया गया

यहां तक कि एक महिला—निदा खान—को इस पूरे मामले का “मास्टरमाइंड” और TCS की HR हेड बताया गया।

सच्चाई क्या निकली?

बाद में सामने आए तथ्यों के अनुसार:

  • संबंधित महिला HR हेड नहीं थीं
  • वे किसी निर्णय लेने वाली भूमिका में भी नहीं थीं
  • उन्हें “फरार” बताया गया, जबकि वे गर्भवती थीं और अपने घर पर थीं

यह खुलासा खुद कंपनी के स्तर पर स्पष्ट किया गया। इससे यह सवाल खड़ा होता है कि बिना जांच पूरी हुए इस तरह के दावे क्यों किए गए?

क्या यह ध्यान भटकाने की कोशिश थी?

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस मामले को सांप्रदायिक रंग देने के पीछे एक संभावित मकसद अन्य विवादित मामलों से ध्यान हटाना भी हो सकता है। उदाहरण के तौर पर, नासिक के एक तथाकथित बाबा अशोक खराड से जुड़े यौन शोषण के आरोप भी चर्चा में थे।

यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है:

  • जब आसाराम या राम रहीम जैसे मामलों में दोष सिद्ध हुआ, तब क्या पूरे हिंदू समाज को दोषी ठहराया गया?
  • जब किसी व्यक्ति पर अपराध साबित होता है, तो क्या पूरे समुदाय को जिम्मेदार ठहराना न्यायसंगत है?

स्पष्ट रूप से नहीं।

मीडिया की भूमिका पर गंभीर सवाल

यह मामला गोदी मीडिया और सोशल मीडिया के उस ट्रेंड को उजागर करता है, जहां:

  • अधूरी जानकारी को सनसनीखेज बनाया जाता है
  • जांच से पहले ही निष्कर्ष निकाल लिए जाते हैं
  • एक समुदाय को सामूहिक रूप से निशाना बनाया जाता है

इस तरह की रिपोर्टिंग न केवल पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि सामाजिक सौहार्द के लिए भी खतरनाक है।

क्या होना चाहिए आगे?

  • निष्पक्ष और पारदर्शी जांच पूरी होने का इंतजार किया जाना चाहिए
  • मीडिया को जिम्मेदारी के साथ रिपोर्टिंग करनी चाहिए
  • किसी भी समुदाय को बिना सबूत के बदनाम करने से बचना चाहिए
  • कार्यस्थल उत्पीड़न जैसे गंभीर मुद्दों को सांप्रदायिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए

निष्कर्ष

TCS नासिक मामला सिर्फ एक कॉर्पोरेट विवाद नहीं, बल्कि यह हमारे समय की मीडिया राजनीति का आईना है। यह दिखाता है कि कैसे एक व्यक्तिगत शिकायत को सामूहिक नफरत के औज़ार में बदला जा सकता है।

इसलिए ज़रूरी है कि हम तथ्यों के साथ खड़े हों, न कि बनाए गए नैरेटिव के साथ।

मुकुल सरल

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