RSS और ABVP की हरकतों से दिल्ली विश्वविद्यालयों में टकराव
दिल्ली के प्रमुख विश्वविद्यालय—दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय—इन दिनों एक बार फिर वैचारिक टकराव के केंद्र में हैं। “आरएसएस गो बैक” जैसे नारे सिर्फ विरोध की आवाज़ नहीं, बल्कि उस व्यापक संघर्ष का प्रतीक हैं जो देश के शैक्षणिक संस्थानों की दिशा और चरित्र को लेकर चल रहा है।
कैंपस में बढ़ती दखलअंदाजी और टकराव
हालिया घटनाओं ने यह साफ किया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद अब कॉलेज परिसरों में अपनी मौजूदगी और प्रभाव को तेज़ी से बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. भीमराव अंबेडकर कॉलेज में 13 अप्रैल को हुई घटना इसका ताज़ा उदाहरण है। जब छात्र अंबेडकर जयंती के अवसर पर एक कार्यक्रम आयोजित करना चाहते थे, उसी समय आरएसएस से जुड़े कार्यक्रम की घोषणा की गई। इस पर विरोध करने वाले छात्रों—खासकर वामपंथी छात्र संगठन SFI—के साथ कथित तौर पर मारपीट हुई।
छात्रों का आरोप है कि इस हिंसा में सिर्फ एबीवीपी कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि बाहरी लोग और यहां तक कि एक प्रोफेसर भी शामिल थे। यह आरोप बेहद गंभीर है क्योंकि यह न केवल छात्र राजनीति बल्कि संस्थागत निष्पक्षता पर भी सवाल उठाता है।
प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर सवाल
घटना के बाद छात्रों का कहना है कि कॉलेज प्रशासन और पुलिस ने उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया। उल्टा, शिकायत करने वाले छात्रों को ही दबाव और धमकी का सामना करना पड़ा।
यह स्थिति एक बड़े सवाल को जन्म देती है—क्या शैक्षणिक संस्थान अब स्वतंत्र विचार और संवाद के मंच बने रह पाएंगे या वे राजनीतिक प्रभाव के उपकरण बनते जा रहे हैं?
जेएनयू में भी विरोध की गूंज
इसी तरह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में 15 अप्रैल को आरएसएस नेता के कार्यक्रम के खिलाफ छात्रों ने विरोध दर्ज किया। यह कार्यक्रम आरएसएस के शताब्दी वर्ष समारोह का हिस्सा बताया गया।
जेएनयू, जो लंबे समय से प्रगतिशील और वामपंथी छात्र राजनीति का गढ़ रहा है, वहां भी इस तरह के आयोजनों का विरोध यह दिखाता है कि वैचारिक संघर्ष अब और तीखा हो चुका है।
शिक्षा के भगवाकरण का आरोप
आलोचकों का कहना है कि केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार के आने के बाद से शिक्षा संस्थानों में वैचारिक हस्तक्षेप बढ़ा है। आरोप हैं कि:
- विश्वविद्यालयों में कुलपतियों और प्रोफेसरों की नियुक्तियां वैचारिक आधार पर की जा रही हैं
- पाठ्यक्रमों में बदलाव कर एक खास विचारधारा को बढ़ावा दिया जा रहा है
- नई शिक्षा नीति 2020 के जरिए शिक्षा प्रणाली को पुनर्गठित किया जा रहा है
लेडी श्रीराम कॉलेज (LSR) का हालिया विवाद भी इसी बहस का हिस्सा बना, जहां प्रिंसिपल द्वारा एक राजनीतिक बयान का छात्रों ने विरोध किया।
आरएसएस की दीर्घकालिक रणनीति
आरएसएस लंबे समय से शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करता रहा है। शिशु मंदिरों से लेकर विश्वविद्यालयों तक, उसका लक्ष्य युवाओं के विचारों को प्रभावित करना बताया जाता है।
आलोचकों के अनुसार, यह केवल सरकार के जरिए नहीं, बल्कि छात्र संगठनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से भी किया जा रहा है।
छात्र प्रतिरोध: सिर्फ कैंपस नहीं, विचार की लड़ाई
इन घटनाओं के बीच एक बात स्पष्ट है—छात्रों का एक बड़ा वर्ग इस हस्तक्षेप का विरोध कर रहा है। उनके लिए यह सिर्फ किसी एक कॉलेज या विश्वविद्यालय की लड़ाई नहीं, बल्कि शिक्षा के स्वरूप और देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने की लड़ाई है।
उनका मानना है कि अगर विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता और विविधता खत्म होती है, तो इसका असर पूरे समाज पर पड़ेगा।
निष्कर्ष
दिल्ली के विश्वविद्यालयों में जो कुछ हो रहा है, वह केवल छात्र संगठनों के बीच झड़प नहीं है। यह एक गहरी वैचारिक लड़ाई है—जिसमें एक तरफ संस्थानों पर नियंत्रण की कोशिश है और दूसरी तरफ स्वतंत्र सोच और प्रतिरोध की परंपरा।
यह सवाल अब सिर्फ छात्रों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है—हम किस तरह की शिक्षा और किस तरह का देश चाहते हैं?
