विशेष सत्र में लोकसभा में 2/3 बहुमत न जुटा सकी मोदी सरकार
देश की संसद में विशेष सत्र के दूसरे दिन एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला, जब मोदी सरकार द्वारा लाया गया संवैधानिक संशोधन बिल—जिसे महिला आरक्षण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था—लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका। यह सिर्फ एक विधायी विफलता नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक दांव के असफल होने की कहानी भी है।
इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष के उस आरोप को मजबूती दी है, जिसे पहले ही Rahul Gandhi ने उठाया था—कि यह बिल पास होने के लिए नहीं, बल्कि चुनावी लाभ के लिए लाया जा रहा है।
राहुल गांधी की भविष्यवाणी सही साबित हुई
संसद में जो हुआ, वह लगभग वही था जिसकी आशंका राहुल गांधी ने जताई थी। उनका कहना था कि Bharatiya Janata Party और प्रधानमंत्री Narendra Modi भली-भांति जानते हैं कि यह बिल पास नहीं हो सकता।
और अंततः हुआ भी यही—संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक 2/3 बहुमत नहीं मिला और बिल गिर गया।
गृह मंत्री के बयान से साफ हुआ चुनावी इरादा
बहस के दौरान Amit Shah का भाषण खासा चर्चा में रहा। मतदान से ठीक पहले उन्होंने जिस तरह से हार की आशंका जताई और कहा कि “हम जहां-जहां चुनाव में जाएंगे, महिलाओं का गुस्सा सुनना पड़ेगा”—उसने पूरे घटनाक्रम की राजनीतिक मंशा को उजागर कर दिया।
यह संकेत था कि सरकार इस बिल को पास कराने से ज्यादा, इसे चुनावी मुद्दा बनाने में दिलचस्पी रखती थी।
12 साल में पहली बार संवैधानिक संशोधन पर इतनी बड़ी हार
Lok Sabha में यह घटना इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि पिछले 12 वर्षों में पहली बार मोदी सरकार को किसी संवैधानिक संशोधन बिल पर इतनी स्पष्ट हार का सामना करना पड़ा है।
अब तक सरकार अक्सर मजबूत स्थिति में रही है, लेकिन इस बार उसे बैकफुट पर आना पड़ा।
विपक्ष एकजुट, लेकिन सवाल ‘नीयत’ पर
Indian National Congress, Trinamool Congress और Dravida Munnetra Kazhagam समेत पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर एकजुट दिखाई दिया।
विपक्ष का साफ कहना था कि अगर सरकार सच में महिलाओं को आरक्षण देना चाहती है, तो उसे इसे तत्काल लागू करना चाहिए था—जैसा कि पहले भी समर्थन मिल चुका था।
सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि अगर दक्षिणी राज्यों के साथ किसी संभावित अन्याय की चिंता थी, तो उसे बिल में स्पष्ट रूप से क्यों नहीं लिखा गया?
डीलिमिटेशन की ‘छिपी हुई राजनीति’?
विपक्ष का आरोप है कि महिला आरक्षण के नाम पर असल में डीलिमिटेशन (सीटों के पुनर्निर्धारण) की जमीन तैयार की जा रही थी। यानी महिलाओं के मुद्दे को एक “राजनीतिक औजार” के रूप में इस्तेमाल किया गया।
इस रणनीति का उद्देश्य चुनावी लाभ लेना था—खासतौर पर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में।
क्या महिलाओं के नाम पर खेला जाएगा ‘विक्टिम कार्ड’?
आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या प्रधानमंत्री मोदी इस मुद्दे को एक “विक्टिम नैरेटिव” में बदलने की कोशिश करेंगे—यह कहते हुए कि विपक्ष ने महिलाओं को उनका अधिकार नहीं मिलने दिया।
लेकिन सवाल यह भी है कि क्या देश की महिलाएं इस राजनीति को समझ नहीं पाएंगी?
सरकार के पास अब भी मौका है
अगर सरकार सच में महिलाओं के हित में काम करना चाहती है, तो अभी भी रास्ता खुला है। वर्तमान 543 सीटों वाली लोकसभा में ही महिला आरक्षण लागू किया जा सकता है—बिना डीलिमिटेशन का इंतजार किए।
लेकिन क्या सरकार ऐसा करेगी? यही असली सवाल है।
