April 19, 2026 3:32 pm
Home » देशकाल » ED का चुनावी रणनीति में इस्तेमाल खुलेआम

ED का चुनावी रणनीति में इस्तेमाल खुलेआम

पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले ED की तेज कार्रवाई ने खड़े किए कई सवाल—क्या यह भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम है या राजनीतिक दबाव की रणनीति?

पश्चिम बंगाल में ताबड़तोड़ कार्रवाई से अब कोई पर्देदारी नहीं रही

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय केवल चुनावी मुकाबले तक सीमित नहीं दिखती, बल्कि यह संघर्ष अब केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता तक फैलता नजर आ रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या Enforcement Directorate (ED) केवल अपनी संवैधानिक भूमिका निभा रही है, या फिर उसका इस्तेमाल चुनावी माहौल को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है।

राज्य में सत्तारूढ़ All India Trinamool Congress (TMC) और मुख्यमंत्री Mamata Banerjee के खिलाफ माहौल बनाने के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। विपक्षी दल Bharatiya Janata Party (BJP) पहले से ही चुनावी मैदान में है, लेकिन अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि ED भी अप्रत्यक्ष रूप से इस राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बन गई है।

चुनावी ऐलान के बाद बढ़ी ED की सक्रियता

मार्च-अप्रैल में चुनाव की घोषणा के बाद ED की कार्रवाई में अचानक तेजी देखने को मिली। विभिन्न कथित घोटालों—जैसे भर्ती घोटाला, जमीन घोटाला, PDS घोटाला और कोयला घोटाला—के नाम पर लगातार छापेमारी और समन जारी किए गए।

इसी दौरान एक प्रमुख कारोबारी विनेश चंदेल की गिरफ्तारी की गई, जिसकी फर्म पर आरोप है कि उसने सरकारी गेहूं को गलत तरीके से बेचा या निर्यात किया। इससे पहले 2 अप्रैल को देशभर में इस फर्म के 11 ठिकानों पर छापेमारी की गई थी। ED का दावा है कि इस मामले में राज्य के बड़े नेताओं और अधिकारियों की संलिप्तता हो सकती है।

नेताओं और अधिकारियों पर शिकंजा

ED की कार्रवाई केवल कारोबारी घरानों तक सीमित नहीं रही। 6 अप्रैल को मंत्री और TMC उम्मीदवार सुझीत बोस को समन भेजा गया, जबकि 8 अप्रैल को मंत्री रतन घोष को भी म्युनिसिपल भर्ती घोटाले में तलब किया गया।

इसके अलावा 3 अप्रैल को TMC उम्मीदवार देवाशीष कुमार से पूछताछ की गई। पुलिस प्रशासन भी इस दायरे से बाहर नहीं रहा—कोलकाता के DCP शांतनु सिन्हा विश्वास को मेडिकल एडमिशन NRI कोटा मामले में समन मिला, जबकि हावड़ा के जॉइंट CP गौरव लाल को एक सिंडिकेट केस में पेश होने के लिए कहा गया।

सवालों के घेरे में एजेंसियों की भूमिका

ED का कहना है कि ये सभी कार्रवाई नियमित प्रक्रिया का हिस्सा हैं। लेकिन विपक्षी दलों और राजनीतिक विश्लेषकों का सवाल है कि आखिर चुनाव के ठीक पहले इतनी आक्रामक कार्रवाई क्यों?

जब कुछ ही दिनों में मतदान होना है, ऐसे में सत्ताधारी दल के मंत्रियों, उम्मीदवारों और अधिकारियों पर लगातार दबाव बनाना क्या चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश नहीं है?

चुनाव आयोग और लोकतांत्रिक भरोसे पर असर

पहले ही चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इसके साथ ही मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटने (SIR प्रक्रिया) की खबरों ने जनता के भरोसे को और कमजोर किया है। ऐसे में केंद्रीय एजेंसियों की इस तरह की सक्रियता लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास को और कम करती है।

बड़ा सवाल: कार्रवाई या राजनीतिक हथियार?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या यह वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई है?
या फिर चुनाव के दौरान विपक्ष को दबाव में लाने की रणनीति?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि क्या ED जैसी जांच एजेंसी अपनी स्वतंत्रता खोकर केंद्र सरकार का राजनीतिक औजार बनती जा रही है।

निष्कर्ष

पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच ED की कार्रवाई ने राजनीति को और तीखा बना दिया है। जहां एक तरफ इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ जरूरी कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप के रूप में भी देखा जा रहा है।

आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि इन कार्रवाइयों का वास्तविक उद्देश्य क्या था—कानून का राज कायम करना या चुनावी समीकरणों को प्रभावित करना।

मुकुल सरल

View all posts