April 14, 2026 11:28 pm
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क्यों मजदूर, मणिपुर, आदिवासी व भाजपा के वोटर, सब गुस्से में

नोएडा, मेरठ, मणिपुर और ओडिशा में मजदूरों और आदिवासियों का उग्र प्रदर्शन। जानिए क्यों बढ़ रहा है देशभर में असंतोष और सरकार पर उठ रहे सवाल।

देश में कई जगहों पर उबल रहा असंतोष, लेकिन सरकार जवाब कब देगी?

ये तस्वीरें किसी युद्धग्रस्त देश की नहीं हैं। न ही ये ईरान, अमेरिका या इज़राइल की हैं। ये तस्वीरें भारत की राजधानी से कुछ ही किलोमीटर दूर की हैं—जहां मजदूर, आदिवासी और आम नागरिक अपनी बुनियादी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं। सवाल सीधा है: क्या ‘विकसित भारत’ के दावों के बीच नागरिकों की आवाज दबाई जा रही है?

नोएडा से मानेसर तक: मजदूरों का गुस्सा क्यों फूटा?

दिल्ली से सटे नोएडा, ग्रेटर नोएडा और औद्योगिक इलाकों में हजारों मजदूर पिछले कई दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी मांग बेहद बुनियादी है—उन्हें उनका हक़ का वेतन मिले

12–13 घंटे काम करने के बावजूद उन्हें महज 10,000 से 13,000 रुपये तक की सैलरी मिल रही है। बढ़ती महंगाई के दौर में यह रकम उनके लिए जीवनयापन के लिए नाकाफी है।

  • गैस सिलेंडर की कीमतें 400–500 रुपये प्रति किलो तक
  • किराया 4000–5000 रुपये
  • बच्चों की शिक्षा और अन्य खर्च

इन हालात में मजदूरों का सड़कों पर उतरना स्वाभाविक है।

जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया, तो गुस्सा और भड़क गया—और यही वजह है कि ये आंदोलन अब राष्ट्रीय खबर बन रहा है।

मेरठ: बुल्डोजर कार्रवाई और बेरोजगारी का संकट

मेरठ में हालात और भी गंभीर हैं।

  • 900 से अधिक घरों पर बुल्डोजर चलाने की तैयारी
  • सेंट्रल मार्केट सील
  • दुकानें, स्कूल और अस्पताल बंद

इस कार्रवाई ने लाखों लोगों को बेरोजगारी और भुखमरी के कगार पर ला खड़ा किया है।

लोगों का कहना है कि उन्होंने सरकार पर भरोसा कर वोट दिया था, लेकिन आज उनकी सुनने वाला कोई नहीं है—न सांसद, न विधायक, न ही प्रशासन।

मणिपुर: न्याय की मांग में फिर सुलगता राज्य

मणिपुर एक बार फिर अशांति की आग में जल रहा है।

महिलाएं और आम नागरिक सड़कों पर हैं, न्याय की मांग कर रहे हैं। लेकिन केंद्र सरकार की प्राथमिकताएं कहीं और नजर आती हैं।

सवाल उठता है—क्या मणिपुर अब राष्ट्रीय विमर्श से बाहर हो चुका है?

ओडिशा के आदिवासी: विकास बनाम विस्थापन

ओडिशा के कोरापुट क्षेत्र से आईं 50 से अधिक गांवों की आदिवासी महिलाएं और पुरुष सड़कों पर हैं।

उनकी मांग है कि सेरुबांध बांध परियोजना, जिसमें वेदांता लिमिटेड को बॉक्साइट खनन का काम मिला है, उसे तुरंत रोका जाए।

पुलिसिया दमन के बावजूद आंदोलन जारी है। यह सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि अस्तित्व का संघर्ष है।

हरियाणा के मानेसर: पुराना संघर्ष, वही सवाल

हरियाणा के मानेसर में भी मजदूर लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं।

  • फैक्ट्रियों में शोषण
  • न्यूनतम मजदूरी का उल्लंघन
  • ओवरटाइम का भुगतान नहीं

यह समस्या नई नहीं है, लेकिन समाधान आज भी दूर है।

सरकार की प्राथमिकताएं बनाम जमीनी हकीकत

जब ये आंदोलन चल रहे थे, उसी समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार में व्यस्त थे।

प्रश्न उठता है—

  • जब चार दिनों से प्रदर्शन हो रहा था, तब सरकार चुप क्यों थी?
  • बातचीत के जरिए समाधान क्यों नहीं निकाला गया?
  • क्या मजदूरों की समस्याएं चुनावी भाषणों से कम महत्वपूर्ण हैं?

मीडिया और संवेदनहीनता का सवाल

यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि जब तक आंदोलन उग्र नहीं होते, तब तक वे खबर नहीं बनते।

  • शांतिपूर्ण प्रदर्शन = अनदेखा
  • हिंसक प्रतिक्रिया = ब्रेकिंग न्यूज

यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।

निष्कर्ष: ‘विकास’ का मॉडल किसके लिए?

देश के अलग-अलग हिस्सों से आ रही ये तस्वीरें एक बड़े संकट की ओर इशारा करती हैं—

  • मजदूर अपने हक के लिए लड़ रहे हैं
  • आदिवासी अपनी जमीन बचाने के लिए
  • आम नागरिक अपने अस्तित्व के लिए

और दूसरी तरफ सरकार ‘विकास’ और ‘विकसित भारत’ के दावे कर रही है।

सबसे बड़ा सवाल यही है:
क्या विकास का यह मॉडल आम नागरिकों को पीछे छोड़ रहा है?

अगर इन आवाजों को अब भी नहीं सुना गया, तो यह असंतोष और व्यापक रूप ले सकता है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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