February 23, 2026 9:55 pm
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कैसे हिस्ट्रीशीटर पिंकी चौधरी के लिए जेल-बेल बन गया खेल!

30+ FIR के बावजूद सक्रिय पिंकी चौधरी और हिंदू रक्षा दल—क्या नफरत की राजनीति को मिल रहा है संरक्षण? पढ़िए पूरी पड़ताल।

हिंदुत्व की राजनीति के नए ‘फुट सोल्जर’: नफ़रती हिंसा की खुली छूट का सवाल

“आज जेल, कल बेल, परसों फिर वही खेल” — यह नारा सिर्फ एक व्यक्ति के समर्थकों का उत्साह नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती का प्रतीक है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई स्वयंभू “धर्म रक्षक” सामने आए हैं, जो नफरत फैलाने, हिंसा को बढ़ावा देने और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोपों के बावजूद खुलेआम सक्रिय हैं।

गाज़ियाबाद का पिंकी चौधरी (असली नाम: भूपेंद्र सिंह तोमर) इसी प्रवृत्ति का एक प्रमुख उदाहरण बनकर उभरा है। सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक-सामाजिक माहौल का है जिसमें ऐसी ताकतें फल-फूल रही हैं।

कौन है पिंकी चौधरी?

हाल ही में वायरल एक वीडियो में पिंकी चौधरी अपने उन समर्थकों का स्वागत करता दिखाई देता है जो मजार तोड़ने के मामले में जेल गए थे। उन्हें फूल-मालाएं पहनाई जाती हैं और “हिंदू धर्म के योद्धा” बताया जाता है।

मजार तोड़ने जैसी कार्रवाई को “हिंदुत्व का काम” बताना इस बात का संकेत है कि धार्मिक आस्था के नाम पर कानून को चुनौती देना एक वैचारिक अभियान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब देश में बेरोज़गारी, गरीबी और बेघर होने जैसी समस्याएँ लाखों लोगों को प्रभावित कर रही हैं, तब “धर्म रक्षा” की राजनीति का केंद्र मस्जिद, मजार और गौ-रक्षा जैसे मुद्दे ही क्यों बने हुए हैं?

लंबा आपराधिक रिकॉर्ड

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पिंकी चौधरी पर पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश, दिल्ली और उत्तराखंड में 30 से अधिक एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं।

इन मामलों में शामिल आरोप:

  • नफरती भाषण
  • सांप्रदायिक तनाव फैलाना
  • हिंसा, मारपीट और तोड़फोड़
  • सरकारी कार्य में बाधा
  • हथियारों का प्रदर्शन
  • धार्मिक कार्यक्रमों में व्यवधान

खुद पिंकी चौधरी दावा करता है कि उसके खिलाफ देशभर में 37 मामले दर्ज हैं — और वह इसे गर्व के साथ बताता है। उसके समर्थकों का नारा “आज जेल, कल बेल…” इसी मानसिकता को दर्शाता है।

कैसे बढ़ा प्रभाव?

  • 2013: हिंदू रक्षा दल की स्थापना
  • 2014: राजनीतिक दफ्तर पर हमले के बाद पहली बड़ी चर्चा
  • 2016–18: अंतरधार्मिक विवाह विरोध, इफ्तार कार्यक्रमों में व्यवधान
  • 2020: चीन विरोध के नाम पर निजी कंपनी पर कार्रवाई
  • 2021: जंतर-मंतर पर मुस्लिम विरोधी नारे
  • 2022–24: हथियारों के साथ प्रदर्शन, झुग्गियों पर हमले, धमकी के मामले
  • 2025–26: तलवार वितरण और फिर गिरफ्तारी के बाद शीघ्र जमानत

कई मामलों में जमानत या केस बंद होने से कार्रवाई का प्रभाव सीमित रहा है।

प्रशासनिक कार्रवाई बनाम बेखौफ सक्रियता

पुलिस का कहना है कि गुंडा एक्ट और जिला बदर जैसी कार्रवाई की गई है। लेकिन लगातार जमानत और दोहराई जा रही घटनाएँ यह सवाल उठाती हैं कि क्या कानून का डर वास्तव में खत्म हो चुका है?

उत्तर प्रदेश में छोटी घटनाओं पर बुलडोज़र कार्रवाई की मिसालें दी जाती हैं, लेकिन ऐसे मामलों में कठोर और स्थायी कार्रवाई क्यों नहीं दिखती — यह सवाल शासन-प्रशासन, खासकर राज्य सरकार से पूछा जा रहा है।

वैचारिक संबंध और राजनीतिक माहौल

पिंकी चौधरी और उसका संगठन औपचारिक रूप से किसी राजनीतिक दल से जुड़े होने से इनकार करते हैं।
लेकिन:

  • वे खुद को बड़े हिंदुत्व संगठनों से वैचारिक रूप से प्रेरित बताते हैं
  • आम धारणा है कि चुनावों में उनका झुकाव भाजपा के पक्ष में रहता है

यहीं से बड़ा सवाल उठता है:
क्या ये “गैर-औपचारिक” संगठन दरअसल उस राजनीति का विस्तार हैं जो ध्रुवीकरण पर आधारित है?

सामाजिक असर: डर, ध्रुवीकरण और सामान्यीकरण

ऐसी गतिविधियों के तीन बड़े प्रभाव दिखाई देते हैं:

  1. सांप्रदायिक अविश्वास में वृद्धि
  2. हिंसक भाषा और कार्रवाई का सामान्यीकरण
  3. कानून की निष्पक्षता पर सवाल

जब आरोपी खुद अपने मामलों को “गौरव” बताने लगें, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चेतावनी है।

निष्कर्ष

पिंकी चौधरी का मामला केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उस राजनीतिक-सामाजिक वातावरण का संकेत है जहाँ नफरत की राजनीति को जगह मिलती है, कानून की प्रक्रिया कमजोर पड़ती दिखती है, और समाज का ताना-बाना खतरे में आता है।

सवाल यह है — क्या हम ऐसे “नए धर्म रक्षकों” के दौर में प्रवेश कर चुके हैं, या अब भी संस्थाएं और समाज मिलकर इस प्रवृत्ति को रोक सकते हैं?

मुकुल सरल

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