‘हिंदू पहचान’, घुसपैठ, जनसंख्या और RSS एजेंडा पर क्या संकेत?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संघ प्रमुख Mohan Bhagwat इन दिनों देशभर में भाषण दे रहे हैं। इसी क्रम में 7 और 8 फरवरी को Mumbai में उनका दो दिवसीय कार्यक्रम हुआ। पहले दिन उन्होंने संबोधन दिया, जबकि दूसरे दिन प्रश्नोत्तर सत्र में विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखे।
इन भाषणों में ‘हिंदू पहचान’, हिंदू-मुस्लिम संबंध, घुसपैठ, जनसंख्या, घर वापसी और संघ-भाजपा संबंध जैसे मुद्दों पर उनके विचार सामने आए। इन बयानों को समझना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संघ की वैचारिक दिशा ही आगे चलकर नीतिगत और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करती है।
‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ की जरूरत नहीं? विरोधाभास का सवाल
भागवत ने कहा कि हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि दोनों समुदाय सदियों से साथ रहते आए हैं।
लेकिन यह तर्क कई सवाल खड़े करता है। एक ओर साथ रहने की बात कही जाती है, वहीं संघ की शाखाओं और वैचारिक साहित्य में बार-बार यह कथन दोहराया जाता रहा है कि मुसलमान ‘आक्रमणकारी’ थे, जिन्होंने मंदिर तोड़े और जबरन धर्मांतरण कराया।
ऐसे में सहअस्तित्व की बात और ऐतिहासिक वैमनस्य के प्रचार—इन दोनों के बीच का विरोधाभास चर्चा का विषय बनता है।
‘हिंदू’ की भौगोलिक परिभाषा: क्या संभव है?
भागवत ने कहा कि ‘हिंदू’ शब्द मूल रूप से भौगोलिक पहचान है और भारत में रहने वाले सभी लोग अपने-आप को हिंदू कह सकते हैं।
लेकिन वर्तमान संदर्भ में ‘हिंदू’ एक धार्मिक पहचान है। इसे अन्य धर्मों—मुस्लिम, ईसाई या अन्य समुदायों—पर थोपना न तो व्यावहारिक है और न ही संवैधानिक दृष्टि से उचित माना जा सकता है।
साथ ही, हिंदू धर्म के भीतर विविध परंपराओं के बावजूद ब्राह्मणवादी संरचना के वर्चस्व पर भी लंबे समय से बहस होती रही है।
नेतृत्व में सामाजिक प्रतिनिधित्व: दावा और वास्तविकता
प्रश्नोत्तर सत्र में भागवत ने कहा कि संघ में कोई भी—गैर-ब्राह्मण, शूद्र, वैश्य या अन्य—सरसंघचालक बन सकता है।
हालाँकि, ऐतिहासिक रूप से संघ के शीर्ष नेतृत्व में सामाजिक विविधता सीमित रही है। इस दावे और वास्तविक प्रतिनिधित्व के बीच अंतर भी विश्लेषण का विषय है।
‘घुसपैठ’ और पहचान का सवाल
भागवत ने ‘घुसपैठियों’ को बड़ी समस्या बताया और कहा कि उन्हें भाषा के आधार पर भी पहचाना जा सकता है।
यह बयान कई स्तरों पर चिंताजनक माना जा रहा है। उदाहरण के लिए, बंगाली भाषा West Bengal और Assam—दोनों जगह व्यापक रूप से बोली जाती है। ऐसे में केवल भाषा के आधार पर नागरिकता या ‘घुसपैठ’ की पहचान करना मनमाने निर्णयों का रास्ता खोल सकता है।
पिछले वर्षों में NRC और नागरिकता से जुड़े अभियानों में भी बड़े पैमाने पर गरीब, दस्तावेज-विहीन और सीमावर्ती समुदायों के प्रभावित होने की आशंकाएँ सामने आई हैं।
जनसंख्या पर बयान: तथ्य क्या कहते हैं?
भागवत ने लोगों को तीन बच्चे पैदा करने की सलाह भी दी।
जबकि राष्ट्रीय स्तर पर कुल प्रजनन दर (TFR) पहले ही प्रतिस्थापन स्तर (लगभग 2.1) तक आ चुकी है और लगातार घट रही है।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त S. Y. Quraishi ने अपनी पुस्तक में भी लिखा है कि मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर तेजी से घट रही है और भविष्य में स्थिर हो जाएगी। इसलिए ‘हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे’ जैसी आशंकाएँ जनसांख्यिकीय तथ्यों से मेल नहीं खातीं।
‘घर वापसी’ तेज करने की बात
भागवत ने ‘घर वापसी’ अभियान को तेज करने की आवश्यकता बताई।
आलोचकों का कहना है कि यह प्रक्रिया आदिवासी और दलित समुदायों के बीच धार्मिक पुनर्पहचान के नाम पर चलती है और व्यवहार में यह भी एक प्रकार का धर्मांतरण ही है।
‘अच्छे दिन’ का श्रेय: RSS बनाम BJP
भागवत ने कहा कि देश में आए ‘अच्छे दिन’ का श्रेय Rashtriya Swayamsevak Sangh को जाता है, न कि केवल Bharatiya Janata Party को।
यह बयान संघ-भाजपा संबंधों पर भी रोशनी डालता है, जहाँ संघ स्वयं को वैचारिक ‘पितृ संगठन’ मानता है।
हालाँकि, सामाजिक वास्तविकताओं—बढ़ती बेरोज़गारी, आर्थिक असमानता और साम्प्रदायिक तनाव—को देखते हुए ‘अच्छे दिन’ के दावे पर सवाल उठते रहे हैं।
निष्कर्ष: भाषण से क्या संकेत मिलते हैं?
मुंबई में दिए गए भाषणों से स्पष्ट है कि संघ की प्राथमिकताएँ—
- सांस्कृतिक-राष्ट्रीय पहचान का पुनर्परिभाषण
- नागरिकता और ‘घुसपैठ’ का मुद्दा
- जनसंख्या और धार्मिक संतुलन की बहस
- घर वापसी जैसे अभियान
—आने वाले समय में सामाजिक-राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं।
एक ओर सहअस्तित्व की भाषा है, तो दूसरी ओर ऐसे मुद्दों पर जोर भी है जो सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ा सकते हैं। यही द्वंद्व इन बयानों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
