February 23, 2026 1:11 am
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गुजरात में बिना माँ बाप की मंजूरी, नहीं होगी शादी!

गुजरात सरकार के नए ड्राफ्ट नियम में विवाह पंजीकरण के लिए माता-पिता की अनुमति अनिवार्य प्रस्तावित। क्या इससे प्रेम, अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह प्रभावित होंगे?

विवादित विवाह नियम: क्या प्रेम, पसंद और संविधान पर नियंत्रण की है तैयारी?

गुजरात की भाजपा सरकार द्वारा विवाह पंजीकरण से जुड़ा नया ड्राफ्ट नियम पेश किए जाने के बाद देशभर में बहस तेज हो गई है। आरोप है कि इस प्रस्तावित व्यवस्था के जरिए प्रेम विवाह, अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण की कोशिश की जा रही है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह कदम नागरिकों के मौलिक अधिकारों—खासकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार—के खिलाफ जाता है?

क्या है नया प्रस्ताव?

गुजरात सरकार ने विधानसभा में विवाह पंजीकरण से संबंधित जो ड्राफ्ट नियम पेश किया है, उसके अनुसार:

  • विवाह के पंजीकरण के लिए माता-पिता की सहमति आवश्यक होगी।
  • आवेदन के समय दंपति को निम्न दस्तावेज जमा करने होंगे:
    • आधार कार्ड
    • मोबाइल नंबर
    • विवाह का निमंत्रण पत्र
    • अन्य पहचान संबंधी दस्तावेज
  • अभिभावकों की मंजूरी के बिना विवाह का पंजीकरण नहीं किया जाएगा।

इसका मतलब है कि यदि दो बालिग अपनी इच्छा से विवाह करते हैं लेकिन परिवार सहमत नहीं है, तो उन्हें कानूनी पंजीकरण में बाधा आ सकती है।

किस पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?

विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह प्रावधान खास तौर पर इन विवाहों को प्रभावित कर सकता है:

  • प्रेम विवाह
  • अंतरजातीय विवाह
  • अंतरधार्मिक विवाह
  • परिवार की इच्छा के खिलाफ शादी करने वाले बालिग जोड़े

भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अंतरजातीय विवाह को सामाजिक समानता का महत्वपूर्ण माध्यम बताया था। आलोचकों का कहना है कि ऐसे नियम सामाजिक नियंत्रण को मजबूत कर सकते हैं।

क्या यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 नागरिकों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय कई बार स्पष्ट कर चुका है कि बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से विवाह करने का पूरा अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले

  1. Lata Singh v. State of Uttar Pradesh
    कोर्ट ने कहा कि बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से विवाह करने का अधिकार है और परिवार या समाज इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते।
  2. Shafin Jahan v. Asokan K.M.
    अदालत ने स्पष्ट किया कि जीवनसाथी चुनना व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है।
  3. Shakti Vahini v. Union of India
    खाप या परिवार द्वारा प्रेम और अंतरजातीय विवाह का विरोध करना असंवैधानिक बताया गया और ऐसे जोड़ों की सुरक्षा के निर्देश दिए गए।

इन फैसलों के संदर्भ में सवाल उठ रहा है कि क्या अभिभावक की सहमति को अनिवार्य बनाना न्यायालय की स्थापित संवैधानिक व्याख्या के विपरीत होगा।

सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि

इस प्रस्ताव के पीछे सामाजिक दबाव की भी चर्चा है। बताया जा रहा है कि कुछ प्रभावशाली जातीय समूह—जैसे पाटीदार, ठाकोर और क्षत्रिय समुदाय—अपनी बेटियों के “स्वतंत्र फैसलों” को लेकर चिंता जता रहे थे। आलोचकों का आरोप है कि राज्य सामाजिक नियंत्रण की मांग को प्रशासनिक ढांचे में बदल रहा है।

यह बहस भी सामने आई है कि क्या ऐसे कदम महिलाओं की स्वायत्तता और उनकी वैवाहिक पसंद को सीमित करने की दिशा में हैं।

उत्तराखंड से आगे बढ़ता कदम?

इससे पहले Uttarakhand में समान नागरिक संहिता और विवाह पंजीकरण से जुड़े कड़े प्रावधानों को लेकर बहस हो चुकी है। अब Gujarat का यह प्रस्ताव उस बहस को और व्यापक बना रहा है।

एक्सप्लेनर बॉक्स: एक नजर में

क्या नया है? – विवाह पंजीकरण के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य प्रस्तावित
किस पर असर? – प्रेम, अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह
संवैधानिक सवाल – क्या यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है?
मुख्य बहस – व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम सामाजिक नियंत्रण

बड़ा सवाल

यदि दो बालिग अपनी इच्छा से विवाह करते हैं, तो क्या राज्य या परिवार को उनके फैसले में हस्तक्षेप का अधिकार होना चाहिए?
यह विवाद सिर्फ एक प्रशासनिक नियम का नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, महिला स्वायत्तता और संविधान की भावना का भी है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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