February 20, 2026 4:13 am
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बांग्लादेश का बीजेपी को सबक़, एक हिंदू समेत दो अल्पसंख्यक बने मंत्री

बांग्लादेश की नई BNP सरकार में हिंदू और आदिवासी नेताओं को कैबिनेट में जगह। अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व पर भारत से तुलना की बहस तेज।

तारिक़ रहमान की नई सरकार में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व में है क्या भारत के लिए कोई संदेश!

बांग्लादेश में नई सरकार के गठन के साथ एक ऐसी राजनीतिक तस्वीर सामने आई है, जिसने दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व और समावेशी राजनीति पर नई बहस छेड़ दी है। ऐसे समय में जब बांग्लादेश में हिंदू समेत धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमलों के आरोपों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंताएँ जताई जा रही थीं, नई सरकार में अल्पसंख्यक समुदायों को कैबिनेट स्तर पर प्रतिनिधित्व मिलना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा रहा है।

नई सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं तारिक रहमान, जिनकी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) चुनाव जीतकर सत्ता में आई है।

चार अल्पसंख्यक सांसद, दो बने कैबिनेट मंत्री

299 सदस्यीय संसद में कुल चार अल्पसंख्यक उम्मीदवार विजयी हुए—इनमें दो हिंदू, एक बौद्ध और एक चकमा (आदिवासी) समुदाय से हैं। विशेष बात यह है कि ये चारों सांसद बीएनपी के टिकट पर चुनाव जीतकर आए हैं।

विजयी अल्पसंख्यक सांसद

  • गोयेश्वर चंद्र राय – ढाका क्षेत्र से निर्वाचित (हिंदू)
  • निताई राय चौधरी – मुगरा क्षेत्र से निर्वाचित (हिंदू)
  • साचिंग प्रू – बौद्ध समुदाय से
  • दीपेन देवान – चकमा (आदिवासी) समुदाय से

इनमें से निताई राय चौधरी और दीपेन देवान को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। नई मंत्रिपरिषद में कुल 49 सदस्य हैं, जिनमें 25 कैबिनेट मंत्री शामिल हैं।

यह प्रतिनिधित्व इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इन उम्मीदवारों ने कई सीटों पर जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवारों को हराया।

अल्पसंख्यक उम्मीदवारों की व्यापक भागीदारी

इस चुनाव में धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय से कुल 89 उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें 10 महिलाएँ भी शामिल थीं।

  • सबसे अधिक 17 अल्पसंख्यक उम्मीदवार कम्युनिस्ट पार्टी ने उतारे।
  • बीएनपी सहित कई दलों ने अल्पसंख्यक समुदायों को टिकट दिया।
  • उल्लेखनीय रूप से, जमात-ए-इस्लामी ने भी अपने इतिहास में पहली बार एक हिंदू उम्मीदवार—कृष्ण नंदी—को मैदान में उतारा (हालाँकि वे चुनाव हार गए)।

पिछली संसद से तुलना

2018 और 2024 के चुनावों में लगभग 17 हिंदू सांसद चुने गए थे, जिनमें अधिकांश आवामी लीग से थे। इस बार संख्या कम होकर चार रह गई है, लेकिन कैबिनेट स्तर पर प्रतिनिधित्व मिलने को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

जनसंख्या और प्रतिनिधित्व का संदर्भ

बांग्लादेश की लगभग 17 करोड़ आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी करीब 8 प्रतिशत है। ऐसे में अल्पसंख्यक समुदायों को मंत्रिपरिषद में स्थान मिलना राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है—विशेषकर उस समय जब देश में सांप्रदायिक तनाव की चर्चाएँ चल रही थीं।

भारत के संदर्भ में राजनीतिक बहस

बांग्लादेश की इस राजनीतिक संरचना की तुलना भारत की वर्तमान राजनीति से भी की जा रही है। आलोचकों का कहना है कि भारत में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी पर मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठते रहे हैं—चाहे वह मंत्रिमंडल हो या लोकसभा टिकटों का वितरण।

इस परिप्रेक्ष्य में बांग्लादेश का उदाहरण दक्षिण एशिया की राजनीति में प्रतिनिधित्व और समावेशन पर एक व्यापक बहस को जन्म देता है।

निष्कर्ष: उथल-पुथल के बीच एक राजनीतिक संकेत

राजनीतिक अस्थिरता, आरोप-प्रत्यारोप और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच हुए इस चुनाव का परिणाम यह संकेत देता है कि प्रतिनिधित्व का प्रश्न अभी भी लोकतांत्रिक वैधता का एक महत्वपूर्ण आधार है।

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की कुल संख्या भले कम प्रतिनिधित्व के रूप में सामने आई हो, लेकिन कैबिनेट स्तर पर उनकी भागीदारी क्षेत्रीय राजनीति में समावेशी संदेश के रूप में देखी जा रही है—और यही कारण है कि इसे दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत की राजनीति के संदर्भ में भी चर्चा का विषय बनाया जा रहा है।

मुकुल सरल

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