जग्गी वासुदेव के कार्यक्रम में क्या कर थे सेना के तीनों अंगों के वर्दीधारी अफसर!
महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित Isha Foundation के कार्यक्रम में एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने सैन्य तटस्थता, राज्य और धर्म के संबंध, तथा संस्थागत मर्यादाओं पर गंभीर बहस खड़ी कर दी है। इस कार्यक्रम के प्रमुख आयोजक आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव (सद्गुरु) थे, जबकि समारोह में देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भाग लिया और सैन्य अधिकारियों को सम्मानित किया।
सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि कार्यक्रम एक निजी धार्मिक आयोजन था, लेकिन इसमें वर्दीधारी सैन्य अधिकारी मंच पर उपस्थित हुए और पुरस्कार ग्रहण किए। आलोचकों का कहना है कि यह सेना जैसी संवैधानिक और पेशेवर संस्था की तटस्थ छवि को प्रभावित करने वाला कदम है।
क्या हुआ कार्यक्रम में?
वीडियो और तस्वीरों में देखा गया कि वायुसेना और नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी—जैसे एयर मार्शल स्तर के अधिकारी और पश्चिमी नौसैनिक कमान से जुड़े अधिकारी—पूरी वर्दी में कार्यक्रम में शामिल हुए।
मंच पर रक्षा मंत्री द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया, जबकि पूरा आयोजन एक धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम का हिस्सा था।
यहाँ मुख्य सवाल उठ रहा है:
- क्या निजी धार्मिक मंच पर वर्दी में सैन्य उपस्थिति उचित है?
- क्या इससे सेना की संस्थागत निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठते?
- क्या सरकार और आध्यात्मिक संगठनों के बीच बढ़ती निकटता संस्थागत सीमाओं को धुंधला कर रही है?
सेना की तटस्थता क्यों महत्वपूर्ण है?
भारतीय सशस्त्र बलों की पहचान एक पेशेवर, गैर-राजनीतिक और धर्मनिरपेक्ष संस्था के रूप में रही है।
सेना:
- किसी राजनीतिक या धार्मिक विचारधारा से सार्वजनिक रूप से नहीं जुड़ती
- विविधता वाले देश में एकीकृत राष्ट्रीय संस्था के रूप में काम करती है
- नागरिक-सैन्य संतुलन और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करती है
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्दीधारी अधिकारी धार्मिक आयोजनों में आधिकारिक उपस्थिति देने लगें, तो यह एक प्रतीकात्मक संदेश देता है कि संस्था किसी विशेष आध्यात्मिक या वैचारिक धारा के साथ खड़ी है।
सरकार–बाबा–राज्य: बढ़ती नजदीकियाँ?
यह पहली बार नहीं है जब राजनीतिक नेतृत्व और आध्यात्मिक गुरुओं के बीच सार्वजनिक मंच साझा करने पर बहस हुई हो।
पिछले वर्षों में:
- कई शीर्ष राजनीतिक नेताओं ने बड़े धार्मिक आयोजनों में भाग लिया
- विभिन्न आध्यात्मिक गुरुओं को सरकारी मंचों पर सम्मान मिला
- राज्य और धार्मिक संस्थाओं के संबंधों पर सार्वजनिक विमर्श तेज हुआ
आलोचकों का कहना है कि जब ऐसे मंचों पर सरकारी पदाधिकारियों के साथ वर्दीधारी सैन्य अधिकारी भी दिखते हैं, तो यह संस्थागत दूरी और भी कम होती दिखाई देती है।
प्रतीकात्मक राजनीति या संस्थागत जोखिम?
इस घटना को लेकर तीन प्रमुख चिंताएँ सामने आ रही हैं:
1. संस्थागत छवि
सेना की निष्पक्षता उसकी सबसे बड़ी ताकत है। धार्मिक मंचों पर आधिकारिक उपस्थिति इस छवि को प्रभावित कर सकती है।
2. नागरिक-सैन्य संतुलन
लोकतंत्र में सेना का सार्वजनिक जीवन में सीमित और पेशेवर दायरा ही स्वस्थ माना जाता है।
3. संदेश और मिसाल
यदि वरिष्ठ अधिकारी ऐसे आयोजनों में वर्दी में जाते हैं, तो यह भविष्य के लिए एक मिसाल बन सकता है।
बड़ा सवाल
क्या यह सिर्फ एक सांस्कृतिक भागीदारी थी?
या फिर यह राज्य, सत्ता, आध्यात्मिक संस्थाओं और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच बनते एक नए समीकरण का संकेत है?
इस बहस का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत जैसे बहुधार्मिक लोकतंत्र में संस्थाओं की धर्मनिरपेक्ष और तटस्थ पहचान ही सामाजिक संतुलन की आधारशिला है।
