February 17, 2026 4:38 am
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PM की कौन सी कमजोर नस दबी है ट्रंप के पास- एपस्टीन, अडानी…

AAP सांसद संजय सिंह का बेबाक भाषा को दिया विशेष इंटरव्यू। संसद गतिरोध, ट्रेड डील, रूस से तेल, SIR विवाद और लोकतंत्र पर खतरे को लेकर मोदी सरकार पर गंभीर आरोप।

विशेष साक्षात्कार: Sanjay Singh का हमला – “ट्रेड डील से लेकर SIR तक, लोकतंत्र पर खतरा”

“आख़िर हमारे गांव का स्कूल बंद होता है तो बजरंग दल क्यों नहीं निकलता? अस्पताल में मोमबत्ती की रोशनी में ऑपरेशन होता है तो RSS सवाल क्यों नहीं उठाता? टूटी सड़कों, बेरोज़गारी और भूख पर इनका खून क्यों नहीं खौलता?”

इन्हीं तीखे सवालों के साथ बेबाक भाषा की इस खास पेशकश में हमने बातचीत की Sanjay Singh से, जो Aam Aadmi Party के राज्यसभा सांसद हैं और विपक्ष की मुखर आवाज़ों में प्रमुख चेहरा माने जाते हैं।

सदन के भीतर और बाहर उनके तेवर लगातार चर्चा में रहे हैं। संसद में जारी गतिरोध, कथित ट्रेड डील, SIR विवाद, जेल यात्रा और विपक्ष की रणनीति—इन सभी मुद्दों पर उन्होंने खुलकर अपनी बात रखी।

“विपक्ष सदन नहीं चलने दे रहा या सरकार चर्चा से भाग रही है?”

संसद में जारी गतिरोध पर सिंह ने सीधा सवाल उठाया—क्या विपक्ष सच में सदन नहीं चलने दे रहा, या सरकार बहस से बच रही है?

उन्होंने तीन कृषि कानूनों का उदाहरण देते हुए कहा कि जब बिजनेस एडवाइजरी कमेटी में विपक्ष ने स्पष्ट विरोध दर्ज कराया, तब भी सरकार बिल लेकर आई। विरोध करने पर सांसदों को निलंबित किया गया। बाद में वही कानून वापस लेने पड़े।

उनका तर्क है—

“अगर सरकार चर्चा तक को तैयार नहीं है, तो विपक्ष क्या करे? विरोध करेगा ही।”

उन्होंने Supreme Court के निर्देशों के बावजूद SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाए और कहा कि आधार कार्ड हर जगह मान्य है, लेकिन वोटर आईडी में नहीं—यह विरोधाभास क्यों?

“एपस्टीन फाइल्स, अडानी और ट्रेड डील—क्या दबाव में फैसले?”

सिंह ने दावा किया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने आए मामलों और Adani से जुड़े आरोपों के दबाव में भारत ने अमेरिका के साथ “सरेंडर जैसी” ट्रेड डील की है।

उन्होंने कहा कि पहले अमेरिका भारत से 2.9% टैक्स लेता था, जिसे बढ़ाकर 25% किया गया और अब 18% किया गया। वहीं भारत ने कई उत्पादों पर 29% तक का टैक्स घटाकर शून्य कर दिया।

“यह ट्रेड डील नहीं, आत्मसमर्पण है।”

उन्होंने Anil Ambani के संदर्भों और कथित अंतरराष्ट्रीय दबावों का जिक्र करते हुए सरकार की पारदर्शिता पर सवाल उठाए।

“रूस से तेल न खरीदने का दबाव—देशहित या समझौता?”

सिंह ने कहा कि भारत को सस्ता तेल Russia से मिलता रहा है, जिससे पिछले 40 महीनों में लगभग 1.53 लाख करोड़ रुपये की बचत हुई।

अगर अमेरिका या वेनेजुएला से महंगा तेल खरीदा जाएगा तो इसका बोझ जनता पर पड़ेगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि China ने अमेरिकी दबाव के बावजूद रूस से तेल आयात बढ़ाया है।

“देश सर्वोपरि होना चाहिए, न कि किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकना।”

जेल यात्रा के बाद भी आक्रामक रुख

आम आदमी पार्टी के कई नेताओं की तरह संजय सिंह भी जेल गए। लेकिन बाहर आने के बाद उनकी आवाज़ और मुखर हुई।

“अगर मैं चुप हो जाता, तो संदेश जाता कि मुझे जेल भेजकर दबा दिया गया। लोकतंत्र में लड़ना पड़ेगा—बहादुरी से।”

उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन का हवाला देते हुए कहा कि आज की चुनौतियाँ उतनी लंबी नहीं होंगी, लेकिन संघर्ष आवश्यक है।

“50 साल का शासन? तो 240 पर कैसे आ गए?”

जब केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने 50 साल के भाजपा शासन की बात कही थी, उस संदर्भ में सिंह ने कहा कि अगर सहयोगी दल साथ न आते तो सरकार बनना मुश्किल था।

उनका दावा है कि 61% लोगों ने भाजपा के खिलाफ वोट दिया, लेकिन वोट प्रबंधन और विपक्षी एकजुटता की कमी से परिणाम प्रभावित हुए।

SIR: लोकतंत्र के लिए “रियल थ्रेट”?

सिंह ने SIR प्रक्रिया को लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि खास समुदायों—मुस्लिम, यादव, दलित—के वोट लक्षित तरीके से काटे जा रहे हैं।

उन्होंने Uttar Pradesh का उदाहरण देते हुए कहा कि दिसंबर में जारी मतदाता सूची और जनवरी की SIR सूची में करोड़ों वोटों का अंतर दिख रहा है।

“अगर एक ही राज्य के कर्मचारी दो अलग-अलग सूचियाँ बना रहे हैं और करोड़ों का फर्क है, तो सवाल उठेंगे ही।”

उन्होंने यह भी कहा कि जब स्वतंत्रता सेनानी Subhas Chandra Bose के परिवार तक को नोटिस मिल सकता है, तो प्रक्रिया की गंभीरता समझी जा सकती है।

सामाजिक मुद्दों पर “खून क्यों नहीं खौलता?”

बातचीत के अंत में सिंह ने संगठनों जैसे RSS और Bajrang Dal पर सवाल उठाए कि धार्मिक मुद्दों पर सक्रियता दिखाने वाले संगठन बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के संकट पर क्यों चुप रहते हैं।

“अगर देशभक्ति सच्ची है, तो भूख, बेरोज़गारी और टूटी सड़कों पर भी उतना ही आक्रोश दिखना चाहिए।”

निष्कर्ष

संजय सिंह का यह इंटरव्यू केवल संसद के गतिरोध तक सीमित नहीं रहा। इसमें अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, आर्थिक नीतियों, चुनावी प्रक्रियाओं और लोकतंत्र की सेहत तक व्यापक सवाल उठाए गए।

विपक्ष की रणनीति, सरकार की जवाबदेही और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता—इन तीनों पर यह बातचीत एक गंभीर राजनीतिक दस्तावेज़ की तरह सामने आती है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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