February 12, 2026 4:47 am
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मोदीजी के बनारस में क्यों दुकानदार लगा रहे आग अपने ही घर-दूकान को!

बनारस की दाल मंडी में बुल्डोज़र कार्रवाई से परेशान एक दुकानदार ने अपने घर-दुकान में आग लगा ली। यह घटना ‘हिंदू खतरे में है’ के नारों के बीच रोज़गार और अस्तित्व के संकट की सच्ची तस्वीर दिखाती है।

दाल मंडी में बुल्डोज़र, और एक दुकानदार की आग: “कौन ख़तरे में है” का जीता-जागता जवाब

बनारस! वही शहर जहाँ से देश के प्रधानमंत्री चुनकर संसद पहुँचते हैं। वही बनारस जहाँ विकास, विरासत और विश्वनाथ कॉरिडोर की चमकदार तस्वीरें देश-दुनिया को दिखाई जाती हैं। लेकिन इसी बनारस के दिल में बसे दाल मंडी इलाके से एक ऐसा वीडियो सामने आता है जो विकास की इन तस्वीरों के पीछे छिपी एक भयावह सच्चाई को उजागर कर देता है।

दाल मंडी में एक दुकानदार ने अपने घर और दुकान पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी।

यह कोई दुर्घटना नहीं थी। यह एक संदेश था। यह हताशा की पराकाष्ठा थी।

क्यों लगी यह आग?

दाल मंडी क्षेत्र में इन दिनों तोड़फोड़ और बुल्डोज़र कार्रवाई चल रही है। स्थानीय दुकानदारों और निवासियों के अनुसार, उन्हें अपने सामान समेटने, वैकल्पिक व्यवस्था करने या कानूनी राहत लेने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया। लोग लगातार 10–12 दिन की मोहलत की गुहार लगा रहे थे।

वे चिल्ला रहे थे। विनती कर रहे थे। दरख्वास्त कर रहे थे।

लेकिन न उनके सांसद ने सुना, न ही उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने।

जब रोज़गार, घर, जीवन की कमाई और अस्तित्व सब एक साथ टूटते दिखे, तो एक दुकानदार ने विरोध का सबसे भयावह तरीका चुन लिया—अपने ही घर और दुकान को आग लगा दी।

यह सिर्फ एक दुकान नहीं थी

यह सिर्फ एक ढांचा नहीं था जिसे तोड़ा जा रहा था।

यह उस व्यक्ति की पूरी जिंदगी थी। उसकी पूंजी, उसका रोज़गार, उसके परिवार का भविष्य, उसके बच्चों की पढ़ाई, उसकी सामाजिक पहचान — सब कुछ उसी दुकान से जुड़ा था।

जब बुल्डोज़र चलता है, तो सिर्फ ईंट और पत्थर नहीं टूटते — इंसान का आत्मसम्मान, उसकी मेहनत और उसका भरोसा भी टूटता है।

‘हिंदू खतरे में है’ बनाम रोज़गार का खतरा

इसी समय देश के अलग-अलग हिस्सों में “जागो हिंदू जागो”, “विराट हिंदू सम्मेलन”, “हिंदू खतरे में है” जैसे नारे गूंज रहे हैं।

लेकिन दाल मंडी का यह वीडियो एक सीधा सवाल खड़ा करता है—

असल में खतरे में कौन है?

क्या वह दुकानदार हिंदू नहीं था?
क्या उसका रोज़गार खतरे में नहीं था?
क्या उसका घर खतरे में नहीं था?

धर्म के नाम पर बड़ी-बड़ी सभाएँ हो रही हैं, लेकिन रोज़गार करने वाले लोग, छोटे दुकानदार, ठेले वाले, कामगार — वे अपने अस्तित्व की लड़ाई अकेले लड़ रहे हैं।

बनारस: विकास का मॉडल या विस्थापन की कहानी?

पिछले कुछ वर्षों में बनारस में बड़े पैमाने पर पुनर्विकास, चौड़ीकरण और कॉरिडोर निर्माण के नाम पर अनेक पुरानी बस्तियाँ और बाजार प्रभावित हुए हैं। सरकार इसे “आधुनिकीकरण” और “धार्मिक पर्यटन” से जोड़ती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि हजारों छोटे व्यापारी विस्थापन, अनिश्चितता और आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं।

दाल मंडी की घटना इस व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है, जहाँ विकास की कीमत छोटे लोगों को चुकानी पड़ रही है।

प्रशासन की संवेदनहीनता

स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने समय मांगा, संवाद मांगा, राहत मांगी — लेकिन उन्हें नोटिस और बुल्डोज़र मिला।

यह सवाल सिर्फ एक इलाके का नहीं है, यह शासन की उस शैली का सवाल है जहाँ संवाद की जगह आदेश और सहमति की जगह बल प्रयोग ले लेता है।

यह वीडियो गवाही है

दाल मंडी का यह वीडियो किसी राजनीतिक भाषण से अधिक प्रभावशाली है। यह किसी बहस से अधिक तीखा है। यह किसी आरोप से अधिक सच्चा है।

यह बताता है कि:

जब शासन नागरिक की सुनना बंद कर देता है, तब नागरिक अपनी जान जोखिम में डालकर अपनी बात कहता है।

और यही इस घटना की सबसे भयावह सच्चाई है।

निष्कर्ष

बनारस से उठी यह आग एक प्रतीक है। यह उस दर्द का प्रतीक है जिसे विकास के शोर में दबा दिया गया है। यह उस सवाल का जवाब है जिसे मंचों से टाला जा रहा है—

“खतरे में कौन है?”

दाल मंडी का दुकानदार इस सवाल का जीवित उत्तर है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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