May 25, 2026 11:51 am
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राज्यसभा में ‘रुदाली’ और लोकसभा से दूरी: सवालों से बचते प्रधानमंत्री?

राज्यसभा में पीएम मोदी के भाषण, लोकसभा में न जाने, महिला सांसदों पर आरोप और अमेरिका ट्रेड डील को लेकर उठे गंभीर सवालों का विश्लेषण।

मोदीजी संसद के भीतर ही ख़ुद को सुरक्षित महसूस नहीं करते, इसलिए लोकसभा में नहीं आए!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया राज्यसभा भाषण कई वजहों से चर्चा में है। भाषण का बड़ा हिस्सा विपक्ष पर हमलों, भावनात्मक आरोपों और बार-बार दोहराए गए एक वाक्य के इर्द-गिर्द घूमता रहा—“वे मोदी की कब्र खोदना चाहते हैं।” यह वाक्य उन्होंने इतनी बार दोहराया कि बहस का केंद्र वही बन गया। सवाल यह है कि जब देश गंभीर प्रश्नों के उत्तर चाहता है, तब यह ‘पीड़ित भाव’ क्यों?

उधर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने का पर्याप्त अवसर न दिए जाने पर भी विवाद है। इसी के साथ लोकसभा अध्यक्ष द्वारा यह संकेत कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा को लेकर आशंका थी—और वह भी विपक्ष की महिला सांसदों से—ने बहस को और तीखा कर दिया। विरोध और हमले के बीच का अंतर लोकतंत्र की बुनियादी समझ है; फिर ऐसा आरोप क्यों और किस आधार पर?

सवालों से ध्यान भटकाने की रणनीति?

विपक्ष जिन मुद्दों को उठाना चाहता था, वे असहज करने वाले हैं। पूर्व थलसेनाध्यक्ष एम.एम. नरवणे की किताब में चीन से जुड़े प्रसंग, संसद के भीतर जवाबदेही, और हाल में अमेरिका के साथ कथित ट्रेड डील की घोषणा—जिसकी जानकारी पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से सामने आई—ये सब प्रश्न मांगते हैं कि सरकार स्वयं स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं देती?

जब विपक्ष इन बिंदुओं पर बहस चाहता है, तब प्रधानमंत्री का भाषण बार-बार “मेरी कब्र खोदने” जैसे जुमले पर लौटता है। क्या यह विमर्श को भावनात्मक बनाकर मूल सवालों से दूरी बनाने की कोशिश है?

लोकसभा में न जाना और ‘हमले’ की आशंका

लोकसभा अध्यक्ष की ओर से यह कहा जाना कि प्रधानमंत्री को संभावित हमले के कारण सदन में आने से रोका गया, अभूतपूर्व है। अगर यह आरोप गंभीर है, तो क्या सरकार इसकी औपचारिक जांच और कार्रवाई करेगी? और यदि नहीं, तो क्या यह केवल एक राजनीतिक ढाल थी?

लोकतांत्रिक परंपरा में विरोध, नारे और तीखी आलोचना सामान्य हैं; उन्हें ‘हमले’ की आशंका बताना संसद की गरिमा और विपक्ष की भूमिका—दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

ट्रेड डील की घोषणा: पारदर्शिता का सवाल

उसी समय अमेरिका के साथ एक महत्वपूर्ण ट्रेड डील की बात सार्वजनिक होती है, जिसकी घोषणा भारत की बजाय अमेरिका की ओर से आती है। संसद और देश यह जानना चाहते हैं कि समझौते की शर्तें क्या हैं, भारत का पक्ष क्या है, और घोषणा की पहल बाहर से क्यों?

डर किससे?

विपक्ष का तर्क है कि सरकार असहज सवालों से बच रही है—चीन, नरवणे की किताब, अंतरराष्ट्रीय समझौते, और संसद में जवाबदेही। ऐसे में भाषण का भावनात्मक स्वर और ‘पीड़ित’ नैरेटिव क्या इस बचाव की रणनीति है?

लोकतंत्र में जवाबदेही का अर्थ

लोकतंत्र में प्रधानमंत्री से तीखे सवाल पूछे जाना असामान्य नहीं, बल्कि आवश्यक है। संसद वह जगह है जहां सरकार को सीधे उत्तर देने होते हैं। यदि विमर्श आरोप-प्रत्यारोप और आशंकाओं की ओर मुड़ जाए, तो मूल प्रश्न पीछे छूट जाते हैं।

राज्यसभा का भाषण और लोकसभा से दूरी—दोनों मिलकर यही संकेत देते हैं कि बहस का केंद्र बदल गया है। लेकिन देश अब भी वही जवाब चाहता है, जिनसे बहस शुरू हुई थी।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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