हिंदू समाज, खासकर महिलाओं पर उसका असर ख़तरनाक है
“टन… टन… टन…” — यह सचमुच खतरे की घंटी है। यह आवाज़ किसी मंदिर की नहीं, बल्कि उस सामाजिक चेतावनी की है जिसे अब अनसुना करना मुश्किल होता जा रहा है। जैसे-जैसे तथाकथित बाबाओं के दरबार बड़े होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे समाज में अंधविश्वास, अवैज्ञानिक सोच और स्त्री-विरोधी मानसिकता भी फैलती जा रही है।
इन दरबारों में आप एक अजीब दृश्य देखते हैं—औरतें “देवी चढ़ी” हालत में नाचती-कूदती हुई आती हैं, बाबा “बम-बम” करते हुए उन्हें शांत करते हैं, पर्चियाँ पढ़ते हैं, भविष्य बताते हैं। यह कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि विवेक और तर्क के सार्वजनिक पतन का दृश्य है।
और इसका सबसे बड़ा नुकसान किसे हो रहा है?
हिंदू महिलाओं को।
उन्हें “बच्चा पैदा करने की मशीन” और उसमें भी “लड़का पैदा करने की मशीन” में तब्दील करने की विचारधारा खुलेआम इन मंचों से प्रचारित की जा रही है।
खबर लहरिया की रिपोर्ट: जमीन से उठते सवाल
बांदा से खबर लहरिया की जाबांज पत्रकारों ने जिस तरह से एक बड़े बाबा के दरबार का ग्राउंड रिपोर्ट किया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। रिपोर्ट यह दिखाती है कि किस तरह अंधविश्वास की अफीम समाज में गहरे तक फैल चुकी है और लोग तेजी से इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं।
पत्रकार सीधे सवाल पूछती हैं—यह अंधविश्वास किस तरह फैलाया जा रहा है? क्यों फैलाया जा रहा है? और किसके कंधों पर फैलाया जा रहा है? जवाब साफ है—औरतों के कंधों पर।
चार बच्चे पैदा करो: डर की राजनीति और जनसंख्या का जाल
इन बाबाओं के मंचों से लगातार यह बात दोहराई जा रही है:
- हिंदुओं को चार बच्चे पैदा करने चाहिए
- अपनी “जोरू, जमीन, जंगल” बचाने के लिए जनसंख्या बढ़ाओ
- नहीं तो भारत का हाल बांग्लादेश जैसा हो जाएगा
यह भाषण केवल तथ्यहीन नहीं है, बल्कि खतरनाक भी है।
भारत और बांग्लादेश की तुलना ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से निराधार है। लेकिन इस झूठ का इस्तेमाल 80% आबादी को डराने के लिए किया जा रहा है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि “बच्चे” शब्द के भीतर “लड़के” छिपे हैं। यह अप्रत्यक्ष रूप से कन्या भ्रूण हत्या की मानसिकता को वैधता देता है। “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे नारे इन मंचों पर बेमानी हो जाते हैं।
स्त्री की देह, स्त्री की पहचान और सार्वजनिक अपमान
इन बाबाओं के बयान खुले तौर पर महिलाओं का अपमान करते हैं:
- मंगलसूत्र और सिंदूर नहीं तो महिला “खुला प्लॉट”
- महिलाओं के शरीर को लेकर अश्लील, अवैज्ञानिक टिप्पणियाँ
- पत्नी को “इंटरटेनमेंट की वस्तु” बताना
- जाति के आधार पर महिलाओं की “शुद्धता” पर टिप्पणी
और हैरानी की बात यह है कि महिलाएं भी इन दरबारों में बैठकर तालियाँ बजाती दिखाई देती हैं। यह दृश्य बताता है कि अंधविश्वास केवल दिमाग नहीं, आत्मसम्मान भी खा जाता है।
अंधविश्वास का सामूहिक उन्माद
स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि लोग एक कुत्ते की पूजा करने लगते हैं क्योंकि वह मंदिर में मूर्ति की परिक्रमा कर रहा था। यह कोई हास्यास्पद घटना नहीं, बल्कि सामाजिक विवेक के पतन का उदाहरण है।
जब समाज तर्क छोड़ देता है, तब वह या तो नफरत में जीता है या अंधविश्वास में। दोनों ही स्थितियाँ लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक समाज के लिए खतरनाक हैं।
राजनीतिक संरक्षण और पाखंड का बाजार
इन बाबाओं का प्रभाव केवल धार्मिक नहीं, राजनीतिक भी है। उन्हें खुला संरक्षण मिलता है, मंच मिलते हैं, प्रचार मिलता है। उनके दरबार एक समानांतर सत्ता केंद्र की तरह काम करने लगते हैं।
“हिंदू राष्ट्र” के नाम पर चल रहा यह खेल असल में हिंदुओं को ही खतरे में डाल रहा है—उन्हें तर्कहीन, भयभीत और स्त्री-विरोधी सोच में धकेल रहा है।
सबसे अधिक शिकार कौन है?
गरीब तबका, जो इलाज, शिक्षा और रोजगार की कमी से जूझ रहा है, वह समाधान इन बाबाओं के दरबार में ढूंढने लगता है।
सवाल जो पूछे जाने चाहिए
यदि ये बाबा लोगों का भविष्य पढ़ सकते हैं, तो उन्हें समाज में हो रही घटनाओं का पूर्वाभास क्यों नहीं होता?
यदि वे चमत्कार कर सकते हैं, तो महिलाओं के जीवन से दुख क्यों नहीं मिटता?
यदि वे धर्म के रक्षक हैं, तो वे स्त्री के सम्मान के खिलाफ क्यों बोलते हैं?
ये सवाल तर्क से पूछे जाते हैं। और यही तर्क इन दरबारों में सबसे ज्यादा अनुपस्थित है।
निष्कर्ष: हिंदू समाज के भीतर से उठती चेतावनी
यह किसी धर्म के खिलाफ सवाल नहीं है। यह उस पाखंड के खिलाफ सवाल है जो धर्म की आड़ में समाज को रसातल में ले जा रहा है।
खतरे की घंटी सचमुच बज रही है।
यह खतरा बाहर से नहीं, भीतर से है।
जब धर्म विवेक खो देता है, तब वह आस्था नहीं, अंधविश्वास बन जाता है।
और जब अंधविश्वास सत्ता से जुड़ जाता है, तब समाज सबसे ज्यादा खतरे में होता है।
