संभल के CJM विभान्शु सुधीर का तबादला और न्याय व्यवस्था पर सवाल
एक समय था जब आम लोग न्याय के लिए अदालत और जजों की ओर उम्मीद से देखते थे। आज हालात ऐसे दिखाई दे रहे हैं कि लगता है जैसे जनता को ही जजों और अदालतों को बचाने के लिए खड़ा होना पड़ेगा। संभल में जो हुआ, उसने इसी आशंका को और गहरा कर दिया है। वकील भी अब खुलकर एक जज के पक्ष में सड़कों पर उतर आए हैं।
मामला संभल का है। वही संभल जहाँ नवंबर 2024 में शाही मस्जिद को लेकर पैदा हुए विवाद ने हिंसक रूप ले लिया था। इस हिंसा में कुछ लोगों की जान गई, कई घायल हुए। आरोप लगे कि पुलिस फायरिंग में भी लोगों को गोली लगी। इन्हीं आरोपों को लेकर एक याचिका मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) विभान्शु सुधीर की अदालत में दाखिल हुई।
9 जनवरी को CJM विभान्शु सुधीर ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए तत्कालीन सीओ अनु चौधरी सहित 20 पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया। याचिकाकर्ता यादेश यामी ने आरोप लगाया था कि उनके बेटे आलम को पुलिस फायरिंग में गोली लगी।
यह एक सामान्य न्यायिक प्रक्रिया थी। अदालत ने आरोपों की जांच के लिए FIR दर्ज करने का आदेश दिया। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह असामान्य था।
जब पुलिस ने अदालत के आदेश को मानने से इंकार किया
पुलिस अधिकारियों ने CJM के आदेश को मानने से इंकार कर दिया। कहा गया कि अनु चौधरी के खिलाफ FIR दर्ज नहीं की जाएगी और इस आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की जाएगी।
यह स्थिति सीधे-सीधे अदालत की अवमानना जैसी प्रतीत होती है। सामान्य प्रक्रिया यह होती है कि पहले अदालत के आदेश का पालन किया जाए — FIR दर्ज की जाए — और उसके बाद यदि असहमति हो तो उच्च अदालत में चुनौती दी जाए। लेकिन यहाँ आदेश को लागू ही नहीं किया गया।
अनु चौधरी वही अधिकारी हैं जिन्हें संभल विवाद के दौरान ही CO से प्रमोट कर ASP बना दिया गया था और वर्तमान में वे फिरोजाबाद में तैनात हैं। ऐसे में उनके खिलाफ FIR दर्ज होना प्रशासनिक और राजनीतिक असहजता का कारण बन सकता था।
फिर आया तबादले का आदेश
कुछ ही समय बाद CJM विभान्शु सुधीर का तबादला कर दिया गया। केवल तबादला ही नहीं, बल्कि उन्हें डिमोट भी किया गया। यह आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से जारी हुआ, लेकिन घटनाक्रम की टाइमिंग ने कई सवाल खड़े कर दिए।
एक जज जिसने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR का आदेश दिया, पुलिस ने आदेश मानने से इंकार किया, और फिर उसी जज का तबादला — यह क्रम संयोग मात्र है या दबाव का परिणाम?
यह पहली घटना नहीं है
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब किसी जज के न्यायिक रुख के बाद उनका तबादला चर्चा का विषय बना हो।
2020 के दिल्ली दंगों के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस मुरलीधर ने भाजपा नेताओं द्वारा दिए गए उग्र भाषणों के मामले में दिल्ली पुलिस को कड़ी फटकार लगाई थी और FIR दर्ज करने को लेकर सख्त टिप्पणी की थी। इसके अगले ही दिन आधी रात को उनका तबादला आदेश जारी कर उन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट भेज दिया गया।
उस समय भी यह सवाल उठा था कि क्या न्यायिक फैसलों का असर जजों के करियर पर पड़ रहा है?
संभल में वकील सड़कों पर क्यों हैं?
संभल में वकीलों ने CJM विभान्शु सुधीर को वापस लाने की मांग को लेकर मोर्चा खोल दिया है। यह किसी व्यक्ति विशेष के समर्थन का मामला नहीं रह गया है, बल्कि न्यायिक स्वतंत्रता के समर्थन का प्रश्न बन गया है।
वकीलों का कहना है कि यदि एक जज केवल इसलिए हटा दिया जाएगा क्योंकि उसने सत्ता या प्रशासन के खिलाफ आदेश दिया, तो फिर अदालतों से न्याय की उम्मीद कैसे की जाएगी?
बड़ा सवाल: क्या न्यायपालिका पर दबाव है?
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या न्यायपालिका पर परोक्ष दबाव बनाया जा रहा है? क्या ऐसे संदेश दिए जा रहे हैं कि ‘सीमा में रहकर’ फैसले दिए जाएँ?
यदि जजों को भी अपने आदेशों के परिणामस्वरूप तबादले या पदावनति का डर रहेगा, तो न्यायिक स्वतंत्रता का क्या होगा?
आज संभल में जो हो रहा है, वह सिर्फ एक जिले का मामला नहीं है। यह उस भरोसे का मामला है जो जनता अदालतों पर करती है।
और शायद पहली बार ऐसा महसूस हो रहा है कि न्याय के लिए अब केवल अदालतों की ओर देखने से काम नहीं चलेगा — जनता और वकीलों को भी अदालतों के साथ खड़ा होना पड़ेगा।
