January 28, 2026 5:27 pm
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हत्यारों के समर्थन में खड़ी होती नफ़रती भीड़

मुरादाबाद में ‘ऑनर किलिंग’: काजल सैनी और अरमान की हत्या

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से आई एक खबर 2026 के भारत की एक भयावह झलक पेश करती है। तीन भाइयों ने मिलकर अपनी ही बहन काजल सैनी की हत्या कर दी। उसके साथ अरमान नाम के युवक की भी जान ले ली गई। दोनों की लाशों को हनुमान मंदिर के पास दफना दिया गया। वजह? आरोप यह कि दोनों एक-दूसरे को जानते थे, एक-दूसरे के संपर्क में थे, और यह संबंध ‘इंटरफेथ’ था।

यह सिर्फ एक हत्या नहीं है। यह उस सामाजिक मानसिकता का आईना है, जिसमें हत्या करने वाले ‘गुनहगार’ नहीं बल्कि ‘हीरो’ बना दिए जाते हैं।

मामले में दो भाइयों—रिंकू और सतीश—को गिरफ्तार किया गया है। लेकिन गिरफ्तारी के साथ ही सोशल मीडिया पर जो अभियान शुरू हुआ, वह कानून से ज्यादा समाज की हालत पर सवाल खड़े करता है। पोस्ट दर पोस्ट यह कहा जाने लगा कि “लव जिहाद का सही इलाज किया गया है।” कई लोग उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बयानों को शेयर कर यह साबित करने की कोशिश करने लगे कि ऐसी हत्याएं किसी बड़ी ‘सामाजिक सुरक्षा’ का हिस्सा हैं।

यह समर्थन किसी एक घटना तक सीमित नहीं है। यह उस सोच का विस्तार है जिसमें एक युवती की अपनी पसंद, उसका अपना परिचय, उसका अपना सामाजिक दायरा—उसके जीवन से बड़ा नहीं माना जाता।

पुलिस की जांच और खुलासा

एक युवक के लापता होने की शिकायत थाना प्रभारी के पास पहुंची। जांच शुरू हुई तो पता चला कि लापता युवक और युवती एक-दूसरे को जानते थे। गहराई से पड़ताल की गई तो सामने आया कि युवती के भाइयों ने दोनों की हत्या कर दी है।

सवाल यह है कि क्या किसी को जानना, किसी से बात करना, किसी से दोस्ती रखना—अब जानलेवा अपराध बन चुका है?

‘ऑनर’ के नाम पर हत्या, और समाज की चुप्पी

इस पूरे मामले में सबसे भयावह पहलू सिर्फ हत्या नहीं है, बल्कि हत्यारों के पक्ष में खड़ा होता एक बड़ा डिजिटल और सामाजिक समर्थन है। यह समर्थन बताता है कि नफरत अब सिर्फ विचार नहीं रही, वह सामाजिक स्वीकृति का रूप ले रही है।

ऐसे मामलों में अक्सर देखा गया है कि कुछ समय बाद थानों के बाहर भीड़ जुटती है, हत्यारों की रिहाई के लिए प्रार्थनाएं होती हैं, ‘धर्म रक्षा’ के नारे लगते हैं। यह अंदेशा नहीं, एक सामाजिक पैटर्न है।

काजल और अर्मान: दो नाम, जो ‘मुद्दा’ बन गए

काजल सैनी और अर्मान—दो इंसान, जिनकी अपनी जिंदगी, अपनी पसंद, अपने सपने थे—अब एक ‘नैरेटिव’ का हिस्सा बना दिए गए हैं। उनकी हत्या को एक वैचारिक औजार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।

यह घटना बताती है कि आज का भारत किस मोड़ पर खड़ा है—जहां इंसान की जान से ज्यादा उसकी पहचान और संबंधों की धार्मिक व्याख्या मायने रखती है।

कानून बनाम भीड़ का नैरेटिव

पुलिस ने कार्रवाई की है, गिरफ्तारियां हुई हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या कानून उस मानसिकता से लड़ पाएगा, जिसमें हत्या करने वाले युवकों को ‘शूरवीर’ कहा जा रहा है?

जब समाज हत्यारों को वैचारिक वैधता देने लगे, तब न्याय की प्रक्रिया सिर्फ अदालतों तक सीमित रह जाती है, और सामाजिक न्याय की जमीन खिसक जाती है।

यह घटना सिर्फ मुरादाबाद की नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जिसमें ‘जानना’ भी जानलेवा हो सकता है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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