January 28, 2026 5:27 pm
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लो जी! ED के कमाल से अब छगन भुजबल भी मनी लॉन्ड्रिंग केस में बरी

महाराष्ट्र सदन घोटाले में ED केस से छगन भुजबल की बरी होने के बाद भाजपा की ‘वॉशिंग मशीन’, जांच एजेंसियों की निष्पक्षता और राजनीतिक पैटर्न पर सवाल।

बीजेपी की ‘वॉशिंग मशीन’: ED केस में बरी होने की कहानियां क्या बताती है?

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर वही पुराना सवाल गूंज रहा है — क्या भाजपा के साथ आते ही नेता ‘पाक-साफ’ हो जाते हैं?
इस बार चर्चा के केंद्र में हैं NCP (अजित पवार गुट) के वरिष्ठ नेता और वर्तमान में देवेंद्र फडणवीस सरकार में मंत्री छगन भुजबल

मुंबई की विशेष अदालत ने महाराष्ट्र सदन घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में छगन भुजबल, उनके बेटे पंकज भुजबल, भतीजे समीर भुजबल समेत लगभग 25 आरोपियों को बरी कर दिया है। यह मामला 2005-06 का था, जब महाराष्ट्र में कांग्रेस-NCP की सरकार थी और छगन भुजबल उपमुख्यमंत्री और लोक निर्माण मंत्री थे।

अदालत ने अपने फैसले में कहा —

जब मूल अपराध (predicate offence) ही सिद्ध नहीं होता, तो मनी लॉन्ड्रिंग का मामला टिक नहीं सकता।

लेकिन इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में जो चर्चा है, वह अदालत के फैसले से आगे की है।

क्या था महाराष्ट्र सदन मामला?

आरोप था कि दिल्ली में महाराष्ट्र सदन के निर्माण का ठेका बिना किसी निविदा प्रक्रिया (tender process) के चमनकर एंटरप्राइजेज को दे दिया गया। जांच एजेंसियों का दावा था कि भुजबल ने अपने पद का दुरुपयोग कर अपने परिवार और उनसे जुड़ी कंपनियों को आर्थिक लाभ पहुंचाया।

टाइमलाइन बहुत कुछ कहती है

वर्षघटनाक्रम
2005-06महाराष्ट्र सदन निर्माण का ठेका
2014केंद्र में मोदी सरकार
2015ACB ने FIR दर्ज की
2016ED ने मनी लॉन्ड्रिंग केस दर्ज किया, भुजबल गिरफ्तार
2018भुजबल को जमानत
2021ACB मामलों में विशेष अदालत से बरी
23 जनवरी 2026ED के मनी लॉन्ड्रिंग केस में भी बरी

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि मामला 2005-06 का है, लेकिन कार्रवाई तेज होती है 2014 के बाद। गिरफ्तारी 2016 में होती है, लंबी जेल यात्रा होती है, और फिर धीरे-धीरे केस कमजोर पड़ता जाता है।

‘वॉशिंग मशीन’ वाली बहस क्यों?

विपक्ष लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि ED, CBI और अन्य जांच एजेंसियां अब राजनीतिक औजार बन चुकी हैं
आरोप यह है कि:

  • जब तक नेता विपक्ष में होता है — वह भ्रष्टाचारी होता है।
  • जैसे ही वह भाजपा या उसके सहयोगी खेमे में जाता है — केस कमजोर पड़ने लगते हैं।
  • जांच की रफ्तार धीमी होती है।
  • अदालत में केस टिक नहीं पाता।

छगन भुजबल का मामला भी इसी बहस को फिर जिंदा कर रहा है। क्योंकि अब वे अजित पवार के साथ भाजपा गठबंधन सरकार में मंत्री हैं।

अदालत का फैसला बनाम राजनीतिक सवाल

अदालत ने कानूनी आधार पर फैसला दिया है — मूल अपराध सिद्ध नहीं, तो मनी लॉन्ड्रिंग नहीं।
लेकिन राजनीतिक सवाल यह है कि:

क्या जांच एजेंसियों की जांच ही इतनी कमजोर थी कि 10 साल बाद भी मामला साबित नहीं हो सका?

यही कारण है कि ममता बनर्जी समेत कई विपक्षी नेता खुले तौर पर ED और केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं।

जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता पर संकट

आज स्थिति यह है कि:

  • चुनाव हों,
  • ED की कार्रवाई हो,
  • CBI की रेड हो,

इन सब पर जनता और विपक्ष का भरोसा लगातार गिरता जा रहा है।
लोकतंत्र में जांच एजेंसियों की साख बहुत महत्वपूर्ण होती है। लेकिन अगर वे राजनीतिक संदर्भ में देखी जाने लगें, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।

निष्कर्ष

छगन भुजबल कानूनी रूप से बरी हो चुके हैं।
लेकिन यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं रह गया है। यह उस बड़े सवाल का हिस्सा बन गया है:

क्या भारत में जांच एजेंसियां निष्पक्ष हैं, या वे सत्ता की राजनीति का हिस्सा बन चुकी हैं?

मुकुल सरल

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