सनातन बनाम सनातन के बीच टकराव ने खड़ा किया छिड़ा सियासी बवाल
जै हो मोदी जी! जै हो योगी जी!
आपके शासनकाल में एक नई लड़ाई जन्म ले चुकी है — सनातन बनाम सनातन।
यह लड़ाई अब मुसलमान, ईसाई, महिला या विपक्ष तक सीमित नहीं रह गई है। यह अब उन संतों तक पहुँच चुकी है जो खुद को सनातन परंपरा का वाहक मानते हैं — लेकिन सरकार की डुगडुगी नहीं बजाते।
उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ जो हुआ, वह केवल एक धार्मिक विवाद नहीं है। यह सत्ता और सनातन के बीच संघर्ष का एक नया अध्याय है।
24 घंटे का नोटिस: “साबित करो कि तुम शंकराचार्य हो”
यूपी प्रशासन ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को 24 घंटे का नोटिस भेजा — अपने शंकराचार्य होने का प्रमाण देने के लिए। साथ ही दूसरा नोटिस कि उनकी वजह से मेले की शांति भंग हुई, इसलिए उनके प्रवेश पर रोक क्यों न लगा दी जाए।
सवाल यह है कि यह अधिकार किसे है कि वह तय करे कि कौन शंकराचार्य है?
वही शंकराचार्य, जिनके आगे प्रधानमंत्री ने सिर झुकाया था
तस्वीरें और वीडियो वायरल हैं — अनंत अंबानी की शादी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के सामने सिर झुकाते हुए। शंकराचार्य उनके गले में माला डालते हुए।
तब वे शंकराचार्य थे।
फिर क्या हुआ?
समस्या तब शुरू हुई जब सवाल पूछे गए
शंकराचार्य ने सवाल उठाए:
- अयोध्या मंदिर के अधूरे निर्माण पर प्राण प्रतिष्ठा क्यों?
- महाकुंभ में अव्यवस्था और मौतों पर जवाबदेही कहाँ है?
- वाराणसी में मणिकर्णिका घाट पर मूर्तियों के टूटने पर प्रशासन मौन क्यों?
यहीं से वे सरकार के लिए असहज हो गए।
मौनी अमावस्या पर स्नान से रोका गया
माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन उन्हें स्नान से रोका गया। पुलिस से कहा-सुनी, धक्का-मुक्की, बदसलूकी — ये घटनाएँ केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं थीं, बल्कि एक प्रतीक थीं।
संदेश साफ था: जो नतमस्तक नहीं होगा, उसे झुकाया जाएगा।
सनातन की परिभाषा अब सत्ता तय करेगी?
यहाँ एक बड़ी रेखा खिंचती दिख रही है।
BJP का सनातन — उसके निशाने पर मुसलमान, ईसाई, महिलाएँ तो पहले से थीं — अब वे “महान सनातनी” भी आ गए हैं जो सरकार की लाइन-लेंथ पर नहीं चलते।
अगर कोई संत मोदी-योगी की जयकार नहीं करता, तो वह भी सुरक्षित नहीं है।
राजनीतिक घमासान: विपक्ष की एंट्री
- अखिलेश यादव ने फोन पर बात कर समर्थन जताया।
- कांग्रेस ने दो दिन लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर क्रोनोलॉजी समझाई।
- पवन खेड़ा ने सवाल उठाया — जब तक ये सवाल नहीं पूछते थे, तब तक शंकराचार्य थे; अब क्यों नहीं?
संवैधानिक सवाल: शिरूर मठ केस (1954)
1954 के शिरूर मठ केस में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि धार्मिक संस्थाओं के आंतरिक मामलों में राज्य दखल नहीं दे सकता। यह अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षित है।
तो फिर यह नोटिस किस आधार पर?
दो एपिक सेंटर: शंकराचार्य और मणिकर्णिका घाट
वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर मूर्तियों के टूटने को लेकर विरोध प्रदर्शन तेज हैं। शंकराचार्य का दावा है कि दो अन्य शंकराचार्य भी उनके साथ हैं — भले सार्वजनिक रूप से न बोलें।
सनातन बनाम सनातन की यह बहस अब और तेज होने वाली है।
सबसे बड़ा सवाल
अगर कुछ समय पहले तक यही शंकराचार्य पूजनीय थे, तो अब क्या बदल गया?
जवाब शायद इतना ही है — उन्होंने सवाल पूछे।
