January 28, 2026 5:25 pm
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ओडिशा के ढेंकनाल की यह तस्वीर, ‘न्यू इंडिया’ की चेतावनी है

ढेंकनाल, उड़ीसा में एक पादरी के साथ बजरंग दल से जुड़े लोगों द्वारा की गई बर्बरता ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानिए पूरी घटना और उससे जुड़े बड़े सवाल।

पादरी से फिर संघी ब्रिगेड की बर्बरता लेकिन मोदीजी चुप, मोदीजी को आशीष देने वाले बिशप भी चुप

ओडिशा के ढेंकनाल से आई एक भयावह घटना देश की सामूहिक चेतना को झकझोर देने के लिए काफी है। अगर यह दृश्य आपको विचलित नहीं करता, तो सच यह है कि आप भी उसी नफरती मानसिकता के साथ खड़े हैं, जो आज इस देश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ खुलेआम हिंसा को सामान्य बना रही है।

‘न्यू इंडिया’ और भीड़ की बढ़ती हिम्मत

ढेंकनाल में एक पादरी के साथ जिस तरह बजरंग दल से जुड़े लोगों ने बर्बर व्यवहार किया — उसे पीटा गया, गोबर खिलाया गया, लहूलुहान किया गया और ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने के लिए मजबूर किया गया — यह कोई अचानक भड़की भीड़ की हरकत नहीं है। यह उस सुनियोजित माहौल का परिणाम है, जो पिछले कुछ वर्षों में तैयार किया गया है, जहाँ भीड़ को यह विश्वास दिला दिया गया है कि उन्हें कानून से ऊपर खड़े होकर ‘धर्म रक्षा’ के नाम पर कुछ भी करने की छूट है।

यह वही दौर है जिसे अक्सर सत्ता के शीर्ष से ‘न्यू इंडिया’ कहा जाता है।

एफआईआर पीड़ित पर, चुप्पी धर्मगुरुओं की

लेकिन सवाल सिर्फ प्रधानमंत्री या भाजपा सरकार से नहीं है।

इस घटना के बाद एक और गहरी चुप्पी है, जो उतनी ही भयावह है — देश के उन बड़े ईसाई धर्मगुरुओं की चुप्पी, जो कुछ ही दिन पहले क्रिसमस के अवसर पर प्रधानमंत्री को आशीर्वचन दे रहे थे। वे कह रहे थे कि ईश्वर उन्हें शांति का मार्ग दिखाए।

4 जनवरी को यह घटना घटती है। एक पादरी को अपमानित किया जाता है, सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, और उस पर जबरन धर्म परिवर्तन कराने का आरोप लगाते हुए उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी जाती है।

लेकिन जिन बिशप्स ने प्रधानमंत्री के साथ मंच साझा किया, वे चुप हैं।

यह चुप्पी सिर्फ मौन नहीं है, यह इस हिंसा के साथ खड़े होने जैसा है।

यह सवाल उठना चाहिए कि 2026 में, एक ऐसे गाँव में जो पूरी तरह हिंदू बहुल है, जहाँ सिर्फ 7–8 ईसाई परिवार रहते हैं, अगर वे अपने घर के भीतर पूजा-अर्चना कर रहे हैं, तो भी बजरंग दल से जुड़े लोग इतनी हिम्मत कैसे कर लेते हैं कि घर में घुसकर इस तरह की बर्बरता करें?

उन्हें यह विश्वास कौन देता है कि वे ऐसा कर सकते हैं?

और उससे भी बड़ा सवाल — जब पीड़ित पर ही एफआईआर दर्ज हो जाती है, तो देश भर के ईसाई धर्मगुरु, चर्च के बड़े पदाधिकारी, चुप क्यों बैठे हैं?

धार्मिक स्वतंत्रता पर बड़ा सवाल

सत्ता का यह दोहरा चरित्र भी समझना होगा। जब चाहें, यही लोग ऐसे संगठनों को खुली छूट दे देते हैं, और जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर छवि की बात आती है, तो चर्च में जाकर कैंडल जला लेते हैं। लेकिन जो लोग उनसे कैंडल जलवाते हैं, क्या वे उनसे सवाल पूछने की नैतिक हिम्मत रखते हैं?

ढेंकनाल की यह घटना सिर्फ एक पादरी की पिटाई नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक ढांचे की पिटाई है, जहाँ अल्पसंख्यकों को अपने ही घरों में पूजा करने के लिए भी डरना पड़े। यह उस कानून व्यवस्था पर सवाल है, जो पीड़ित को ही अपराधी बना देती है।

और यह उन धार्मिक नेतृत्वों पर भी सवाल है, जो सत्ता के साथ तस्वीर खिंचवाने में तो सक्रिय हैं, लेकिन अपने समुदाय के अपमान पर खामोश हैं।

आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बजरंग दल ने क्या किया।

सवाल यह है कि यह सब होते हुए, कौन-कौन चुप है — और क्यों?

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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