February 23, 2026 9:15 pm
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भागवत जी, जब सब हिंदू तो फिर कैसी ‘घर वापसी’!

मोहन भागवत के घर वापसी और तीन बच्चे वाले बयान से जनसंख्या, धर्मांतरण और धार्मिक स्वतंत्रता पर नई बहस छिड़ी। तथ्य और विश्लेषण पढ़ें।

जनसंख्या, धर्मांतरण और धार्मिक स्वतंत्रता पर नई बहस

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक Mohan Bhagwat के हालिया बयान ने एक बार फिर देश में ‘घर वापसी’, जनसंख्या और धार्मिक पहचान के मुद्दों को केंद्र में ला दिया है। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि घर वापसी अभियान को तेज किया जाना चाहिए और हिंदू परिवारों को कम से कम तीन बच्चे पैदा करने चाहिए। यह बयान कई स्तरों पर सवाल खड़े करता है—जनसंख्या के आंकड़ों से लेकर धर्मांतरण की परिभाषा और धार्मिक स्वतंत्रता तक।

‘सभी हिंदू हैं’ बनाम ‘हिंदू परिवार’ का सवाल

संघ की विचारधारा अक्सर यह कहती रही है कि भारत में रहने वाले सभी लोग सांस्कृतिक रूप से हिंदू हैं। लेकिन जब अलग से “हिंदू परिवारों” को अधिक बच्चे पैदा करने की अपील की जाती है, तो यह सवाल उठता है कि यदि सभी हिंदू हैं, तो अलग पहचान की आवश्यकता क्यों?

अपने भाषण में भागवत ने Ramakrishna Mission, Art of Living Foundation, बौद्ध और जैन परंपराओं को भी हिंदू परंपरा का हिस्सा बताया। यह व्याख्या लंबे समय से वैचारिक विवाद का विषय रही है।

जनसंख्या का मिथक और वास्तविकता

भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) वर्तमान में लगभग 2.1 के आसपास है, जिसे जनसंख्या स्थिरता का स्तर माना जाता है। हिंदू और मुसलमानों के बीच प्रजनन दर का अंतर भी लगातार घट रहा है।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त S. Y. Quraishi ने अपनी पुस्तक The Population Myth में स्पष्ट किया है कि भारत में मुसलमानों के बहुसंख्यक बनने की आशंका तथ्यात्मक रूप से निराधार है। उनके अनुसार, आने वाले दशकों में मुस्लिम आबादी अधिकतम 18% के आसपास स्थिर हो सकती है।

‘घर वापसी’ क्या है?

घर वापसी संघ परिवार का एक लंबे समय से चल रहा अभियान है। इसका उद्देश्य उन लोगों को “वापस” हिंदू धर्म में लाना बताया जाता है, जिन्हें कथित रूप से पहले अन्य धर्मों में परिवर्तित किया गया था।

इस अभियान में पूर्व केंद्रीय मंत्री Dilip Singh Judeo की सक्रिय भूमिका रही। विभिन्न क्षेत्रों—विशेषकर आदिवासी और दलित समुदायों—में जाकर यह कहा जाता है कि वे मूलतः हिंदू थे और उन्हें वापस अपने “मूल धर्म” में आना चाहिए।

आगरा में एक घटना सामने आई थी, जहां गरीब मुस्लिम परिवारों को सहायता और सुविधाओं का आश्वासन देकर एक अनुष्ठान में शामिल किया गया और बाद में इसे घर वापसी बताया गया।

आदिवासी इलाकों में ‘शबरी कुंभ’ और अन्य धार्मिक आयोजनों के माध्यम से भी ऐसे अभियान चलाए जाते रहे हैं।

धर्मांतरण कानून और दोहरे मानदंड का आरोप

भारत के कई राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये कानून मुख्य रूप से ईसाई मिशनरियों या मुसलमानों के खिलाफ इस्तेमाल होते हैं, जबकि घर वापसी को धर्मांतरण नहीं, बल्कि “पुनरागमन” बताया जाता है।

कई विद्वानों ने यह भी सवाल उठाया है कि यदि किसी व्यक्ति को हिंदू बनाया जाता है, तो उसे किस जाति में रखा जाएगा? भाजपा के कुछ नेताओं ने कहा कि उन्हें उनकी “मूल जाति” में ही वापस रखा जाएगा—जो इस प्रक्रिया में जाति व्यवस्था की निरंतरता पर भी सवाल खड़े करता है।

दलित-आदिवासी संदर्भ

इतिहास बताता है कि दलितों के एक हिस्से ने जातिगत भेदभाव से मुक्ति के लिए अन्य धर्मों को अपनाया। स्वयं Swami Vivekananda ने भी स्वीकार किया था कि सामाजिक अन्याय धर्मांतरण का एक बड़ा कारण रहा है।

आदिवासी समुदायों के मामले में स्थिति और जटिल है, क्योंकि उनकी अपनी स्वतंत्र सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएं हैं। ऐसे में उन्हें “पहले हिंदू” बताना भी विवादित दावा माना जाता है।

आंकड़े क्या कहते हैं?

पिछले दशकों के जनगणना रुझानों के अनुसार:

  • ईसाई आबादी में कोई बड़ा उछाल नहीं आया है
  • आदिवासी क्षेत्रों में धर्मांतरण के दावों के बावजूद प्रतिशत वृद्धि सीमित रही है
  • कई अध्ययनों में ईसाई आबादी की वृद्धि दर घटने की बात सामने आई है

इसके बावजूद धर्मांतरण को लेकर हिंसा और आरोपों की घटनाएं सामने आती रहती हैं।

मूल प्रश्न: धार्मिक स्वतंत्रता

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद का धर्म मानने, बदलने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता देता है। आलोचकों का कहना है कि:

  • यदि किसी धर्म में जाने को धर्मांतरण माना जाता है,
  • तो उसी तरह किसी धर्म में लाने को भी समान रूप से देखा जाना चाहिए।

एक लोकतांत्रिक समाज में धार्मिक स्वतंत्रता का सिद्धांत समान रूप से लागू होना चाहिए, न कि अलग-अलग मानदंडों के साथ।

निष्कर्ष

मोहन भागवत का बयान केवल एक धार्मिक या वैचारिक अपील नहीं है, बल्कि यह भारत में जनसंख्या की राजनीति, धार्मिक पहचान, जाति संरचना और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी बड़ी बहस को फिर सामने लाता है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है—क्या धार्मिक पहचान और जनसंख्या का प्रश्न राजनीतिक लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल हो रहा है, और क्या इससे नागरिकों की व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है?

राम पुनियानी

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