राहुल गांधी को जान से मारने की धमकी: नफरत की राजनीति और कानून व्यवस्था पर बड़े सवाल
देश की राजनीति में हिंसक भाषा और खुली धमकियों का स्तर लगातार चिंताजनक होता जा रहा है। हाल ही में एक वीडियो सामने आया जिसमें एक व्यक्ति ने न केवल कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi को घर में घुसकर गोली मारने की धमकी दी, बल्कि कांग्रेस के 25 सांसदों को भी निशाना बनाने की बात कही। यह घटना केवल एक आपराधिक धमकी भर नहीं है, बल्कि देश के लोकतांत्रिक माहौल, राजनीतिक संस्कृति और कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
कौन है धमकी देने वाला और क्या कहा गया?
वीडियो में दिख रहा व्यक्ति स्वयं को भाजपा कार्यकर्ता और करणी सेना से जुड़ा बताता है। वह खुले तौर पर कहता है कि यदि ऐसी घटनाएँ दोबारा हुईं तो वह राहुल गांधी को उनके घर में घुसकर गोली मार देगा।
इस व्यक्ति की पहचान राजस्थान के कोटा निवासी राजा अमेरा के रूप में हुई, जिसे बाद में गिरफ्तार कर लिया गया।
इस वीडियो में सबसे चिंताजनक बात केवल धमकी नहीं, बल्कि वह राजनीतिक संदर्भ है जिसमें यह भाषा इस्तेमाल की गई। आरोपी बार-बार शीर्ष नेताओं के बयानों का हवाला देता है और दावा करता है कि राहुल गांधी “देश के खिलाफ काम कर रहे हैं”।
नेताओं के बयान और नफरत का माहौल
घटना से पहले केंद्रीय मंत्री Kiren Rijiju ने एक इंटरव्यू में राहुल गांधी को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए “खतरा” बताया था।
ऐसे बयान राजनीतिक आलोचना की सीमा से आगे जाकर विपक्ष को राष्ट्रविरोधी ठहराने का माहौल बनाते हैं।
इसी संदर्भ में वीडियो में आरोपी ने लोकसभा अध्यक्ष Om Birla का नाम भी लिया। सोशल मीडिया पर आरोपी की ओम बिड़ला के साथ तस्वीरें भी वायरल हुईं, जिसके बाद जवाबदेही की मांग और तेज हो गई।
सवाल यह है कि जब सत्ता पक्ष के शीर्ष स्तर से विपक्ष को राष्ट्रविरोधी बताया जाता है, तो क्या इससे जमीनी स्तर पर कट्टर और हिंसक मानसिकता को बढ़ावा नहीं मिलता?
“गोडसे की फैक्ट्री” वाली राजनीति?
कांग्रेस नेताओं ने इस घटना को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि देश में नफरत का ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है जहाँ हिंसा की भाषा सामान्य होती जा रही है।
यह आरोप लगाया गया कि “स्टेट एक्टर्स और नॉन-स्टेट एक्टर्स” मिलकर लंबे समय से राहुल गांधी के खिलाफ नफरत का नैरेटिव बना रहे हैं।
राजनीतिक असहमति लोकतंत्र का आधार है, लेकिन जब विरोधियों को देशद्रोही या खतरा बताने की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो उसका परिणाम इसी तरह की चरम प्रतिक्रियाओं के रूप में सामने आता है।
कानून व्यवस्था पर सवाल
इस पूरे मामले में दो महत्वपूर्ण प्रश्न उठते हैं:
- क्या विपक्ष के नेताओं की सुरक्षा को पर्याप्त गंभीरता से लिया जा रहा है?
- क्या नफरत फैलाने वाले राजनीतिक बयानों पर कोई जवाबदेही तय होगी?
वीडियो में खुलेआम हत्या की धमकी देना केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि दंडनीय आपराधिक कृत्य है। हालांकि आरोपी की गिरफ्तारी हुई है, लेकिन व्यापक राजनीतिक और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रश्न अभी भी बना हुआ है।
“मानवता” के दावों और जमीनी हकीकत का विरोधाभास
यह घटना ऐसे समय सामने आई जब प्रधानमंत्री Narendra Modi वैश्विक मंच पर एआई के लिए “मानव-केंद्रित” विजन और नैतिक शासन की बात कर रहे थे।
लेकिन देश के भीतर विपक्ष के नेता को खुलेआम गोली मारने की धमकी मिलना इस बात की ओर इशारा करता है कि राजनीतिक संवाद का स्तर कितना गिर चुका है।
लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि असहमति के सम्मान और राजनीतिक संवाद की गरिमा से चलता है।
यदि विपक्ष को दुश्मन और आलोचना को देशद्रोह बताया जाएगा, तो समाज में हिंसक मानसिकता का फैलना स्वाभाविक है।
यह घटना एक व्यक्ति की आपराधिक हरकत से ज्यादा, उस राजनीतिक माहौल का आईना है जहाँ नफरत की भाषा सामान्य होती जा रही है।
