असम दौरे पर गृह मंत्री के भाषण पर उठे सवाल
असम में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही एक बार फिर ‘घुसपैठिया’ का मुद्दा राजनीतिक केंद्र में आ गया है। केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah के हालिया असम दौरे के दौरान दिए गए भाषणों में बार-बार घुसपैठ का उल्लेख किया गया और जनता से अपील की गई कि भारतीय जनता पार्टी को फिर से सत्ता में लाया जाए, ताकि “घुसपैठियों को चुन-चुन कर बाहर निकाला जा सके”।
लेकिन इस बयान के साथ कई बुनियादी सवाल भी खड़े होते हैं।
सबसे पहला सवाल यह है कि यदि 2014 से केंद्र में और 2016 से असम में भाजपा की सरकार है, तो अब तक कितने घुसपैठियों की पहचान हुई और कितनों को बाहर किया गया? चुनावी मंचों पर बड़े आंकड़े बताए जाते हैं, लेकिन उनके समर्थन में कोई स्पष्ट सरकारी डेटा सामने नहीं आता।
गृह मंत्री ने अपने भाषण में यह भी कहा कि असम में लाखों घुसपैठिए मौजूद हैं और कई जिलों का नाम लेते हुए उन्हें समस्या-ग्रस्त क्षेत्र बताया। जिन जिलों का उल्लेख किया गया—धुबरी, बारपेटा, दरंग, मोरीगांव, नगांव और गोलपाड़ा—वे सभी मुस्लिम बहुल इलाके हैं। इससे यह सवाल और गहरा होता है कि क्या ‘घुसपैठ’ का मुद्दा प्रशासनिक समस्या से अधिक राजनीतिक और साम्प्रदायिक विमर्श का हिस्सा बन गया है?
सत्ता और जवाबदेही का सवाल
असम में पिछले लगभग एक दशक से भाजपा की सरकार है और वर्तमान में राज्य की कमान मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma के हाथों में है। ऐसे में यह अपेक्षित है कि सरकार स्पष्ट रूप से बताए:
- कितने लोगों की पहचान घुसपैठिए के रूप में हुई?
- उनकी पहचान की प्रक्रिया क्या रही?
- अब तक कितने मामलों में कार्रवाई हुई?
यदि यह एक गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसांख्यिकीय मुद्दा है, तो इसका ठोस और पारदर्शी डेटा सार्वजनिक होना चाहिए।
चुनावी राजनीति और ‘घुसपैठिया’ विमर्श
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असम की राजनीति में ‘घुसपैठिया’ का मुद्दा लंबे समय से चुनावी ध्रुवीकरण का एक प्रमुख उपकरण रहा है। चुनाव नजदीक आते ही यह मुद्दा अधिक तीव्रता से उभरता है।
दूसरी ओर, कांग्रेस की नेता Priyanka Gandhi ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि वह असम को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की राजनीति कर रही है और राज्य के संसाधनों तथा सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचा रही है।
असली सवाल क्या है?
असम की राजनीति में इस समय तीन स्तरों पर बहस चल रही है:
- क्या घुसपैठ का वास्तविक और प्रमाणित आंकड़ा मौजूद है?
- क्या प्रशासनिक कार्रवाई चुनावी भाषणों के अनुरूप हुई है?
- क्या इस मुद्दे का इस्तेमाल विशेष समुदायों को निशाना बनाने और चुनावी ध्रुवीकरण के लिए किया जा रहा है?
चुनाव की औपचारिक घोषणा अभी बाकी है, लेकिन राजनीतिक माहौल साफ संकेत दे रहा है—जैसे-जैसे चुनाव करीब आते हैं, ‘घुसपैठिया’ का मुद्दा फिर प्रमुख चुनावी नैरेटिव बन जाता है।
