February 22, 2026 11:45 pm
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देश में जाति की हक़ीक़त के दो पहलू- एक जज, एक वीसी

मद्रास हाई कोर्ट के जज ने जाति उन्मूलन की बात कही, जबकि जेएनयू वीसी के बयान ने विवाद खड़ा किया। जानिए जाति पर दो विरोधी दृष्टिकोण।

Madras High Court के जज का प्रगतिशील हस्तक्षेप बनाम Jawaharlal Nehru University की वीसी का विवादित बयान

देश में जाति को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। एक ओर तमिलनाडु से ऐसी न्यायिक टिप्पणी सामने आई है जो सामाजिक बराबरी की दिशा में ठोस हस्तक्षेप मानी जा रही है, तो दूसरी ओर देश की राजधानी दिल्ली से एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की कुलपति का बयान जाति और सामाजिक भेदभाव की समझ को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। ये दोनों घटनाएँ भारत में जाति-विमर्श की दो अलग-अलग दिशाएँ दिखाती हैं।

जाति उन्मूलन पर न्यायिक हस्तक्षेप

Justice Bharatha Chakravarthy, जो Madras High Court के न्यायाधीश हैं, ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि जाति का उन्मूलन आवश्यक है और जाति को सामाजिक व्यवहार में जीवित रखने की हर कोशिश पर रोक लगनी चाहिए

उन्होंने स्पष्ट कहा कि:

  • जाति की “गंदगी” दिमाग में होती है और इसे सामाजिक व्यवहार से खत्म करना जरूरी है।
  • तमिलनाडु सरकार द्वारा सार्वजनिक धन से आयोजित मंदिर कार्यक्रमों में भेजे जाने वाले निमंत्रण पत्रों पर सरनेम (उपनाम) का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
  • निमंत्रण ऐसे हों जिनसे किसी व्यक्ति की जाति की पहचान न हो सके।

न्यायाधीश ने इसे सामाजिक सुधार की दिशा में एक आवश्यक कदम बताते हुए इसे Annihilation of Caste की भावना के अनुरूप बताया—वह ऐतिहासिक विचार जिसमें डॉ. B. R. Ambedkar ने जाति व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने की बात कही थी।

यह टिप्पणी न केवल प्रशासनिक सुधार का सुझाव है, बल्कि सामाजिक मानसिकता बदलने की दिशा में एक मजबूत संदेश भी है। इसे तमिलनाडु में सामाजिक न्याय की परंपरा और राज्य की द्रविड़ राजनीति की पृष्ठभूमि में भी देखा जा रहा है, जहां वर्तमान में M. K. Stalin की सरकार है।

जेएनयू की कुलपति का बयान और विवाद

इसके ठीक विपरीत, दिल्ली स्थित Jawaharlal Nehru University की कुलपति Santishree Dhulipudi Pandit के एक साक्षात्कार ने नई बहस छेड़ दी।

उन्होंने कहा कि:

  • “ब्लैक्स और दलितों में एक तरह की विक्टिमहुड मानसिकता होती है।”
  • “हर समय अपने को पीड़ित समझना सही नहीं है, हर समय कोई शत्रु नहीं होता।”

इस बयान की व्यापक आलोचना हुई, क्योंकि आलोचकों का कहना है कि यह टिप्पणी ऐतिहासिक और संरचनात्मक भेदभाव की वास्तविकता को कमतर करती है। भारत में दलित समुदाय सदियों से सामाजिक बहिष्कार, हिंसा और भेदभाव का सामना करता रहा है, जिसे केवल मानसिकता या “विक्टिमहुड” के रूप में देखना समस्या की जड़ों को नज़रअंदाज़ करना माना जा रहा है।

दो दृष्टिकोण, एक सवाल

इन दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखें तो एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है:

  • क्या जाति समस्या को संरचनात्मक अन्याय के रूप में समझकर उसे समाप्त करने के ठोस कदम उठाए जाएँ?
  • या फिर सामाजिक भेदभाव के अनुभवों को “पीड़ित मानसिकता” कहकर उसकी गंभीरता को कम किया जाए?

जहाँ एक ओर न्यायपालिका का एक हिस्सा सामाजिक व्यवहार से जाति पहचान हटाने की बात कर रहा है, वहीं शिक्षा संस्थानों के शीर्ष पद से आए बयान जातिगत उत्पीड़न के अनुभवों की वैधता पर ही प्रश्न खड़ा करते दिखते हैं।

सामाजिक संदर्भ और व्यापक बहस

भारत में जाति केवल पहचान का सवाल नहीं, बल्कि अवसर, शिक्षा, रोजगार और सम्मान से जुड़ा हुआ ढांचा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़े और विभिन्न सामाजिक अध्ययन लगातार यह दिखाते रहे हैं कि दलितों और आदिवासियों के खिलाफ हिंसा और भेदभाव की घटनाएँ अब भी व्यापक हैं।

ऐसे में:

  • न्यायपालिका की प्रगतिशील टिप्पणियाँ सामाजिक सुधार की दिशा में उम्मीद जगाती हैं।
  • वहीं, शैक्षणिक नेतृत्व से आए विवादित बयान सामाजिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करते हैं।

निष्कर्ष

2026 के भारत में जाति पर यह बहस केवल विचारों की नहीं, बल्कि दृष्टिकोण और जिम्मेदारी की बहस है। एक तरफ डॉ. आंबेडकर के जाति उन्मूलन के सपने की दिशा में बढ़ने की कोशिशें हैं, तो दूसरी तरफ सामाजिक भेदभाव के अनुभवों को लेकर असंवेदनशीलता भी सामने आ रही है।

इन दो तस्वीरों में से कौन-सी तस्वीर भारत के लोकतांत्रिक और समानता आधारित भविष्य को मजबूत करती है—यह सवाल समाज के सामने है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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