नफरत का बढ़ता साया: जब भीड़, सत्ता और पुलिस एक ही कतार में खड़ी दिखें
बात अब सचमुच हाथ से निकलती दिख रही है। कल तक जिन्हें “फ्रिंज एलिमेंट”, “उपद्रवी तत्व”, “ट्रोल आर्मी” कहकर खारिज किया जाता था, आज वही लोग सड़कों पर खुलेआम हिंसा कर रहे हैं—और सबसे चिंताजनक बात यह है कि कई जगह पुलिस-प्रशासन की भूमिका मूकदर्शक जैसी नजर आती है। सवाल यह है कि जब नफरत का यह उफान संस्थागत सहमति या संरक्षण के संकेत देने लगे, तब लोकतंत्र की सेहत का क्या होता है?
समता उत्सव पर हमला: विचार से डर क्यों?
हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर में “समता उत्सव” के दौरान देश के जाने-माने इतिहासकार प्रोफेसर इरफान हबीब पर पानी फेंककर हमला किया गया। आयोजन छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) द्वारा किया गया था। सवाल सीधा है—अगर एक बौद्धिक कार्यक्रम भी सुरक्षित नहीं, तो असहमति की जगह कहाँ बचेगी?
घटना के बाद सामने आए वीडियो और तस्वीरों में हमलावरों की दबंगई और नारेबाजी दिखी। आरोप यह भी लगा कि स्थानीय थाने में मौजूद लोगों के प्रति पुलिस का रवैया सख्त नहीं था। यदि यह धारणा बनती है कि विचार व्यक्त करने पर हमला होगा और कानून निष्पक्ष नहीं दिखेगा, तो भय का वातावरण गहराता है।
नारे, वीडियो और ‘नॉर्मलाइज’ होती हिंसा
“गोली मारो…” जैसे नारे अब नए नहीं रहे। राजनीतिक विमर्श में उत्तेजक बयानबाजी का इतिहास रहा है—जैसे अनुराग ठाकुर के भाषणों पर हुई बहस—पर अब यह ट्रेंड सोशल मीडिया के AI वीडियो तक पहुँच चुका है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से जुड़े एक विवादित AI वीडियो ने भी राजनीतिक मर्यादाओं पर प्रश्न खड़े किए।
जब सार्वजनिक जीवन में उग्र प्रतीकों और हिंसक भाषा को बार-बार दोहराया जाता है, तो वह सामान्यीकृत होने लगती है। इतिहास गवाह है कि उग्र राष्ट्रवाद और बहुसंख्यक वर्चस्व की राजनीति—जिसकी जड़ें भारत में नाथूराम गोडसे के दौर तक जाती हैं—भीड़ हिंसा को वैचारिक आवरण दे सकती है।
इंदौर से मेरठ तक: प्यार भी ‘इजाज़त’ का मोहताज?
इंदौर में वैलेंटाइन डे के विरोध में कॉलेजों में तोड़फोड़ के वीडियो सामने आए। वहीं मेरठ में अंतरधार्मिक विवाह करने जा रहे एक जोड़े—आकांक्षा गौतम और साहिल—को विरोध और आरोपों के दबाव में शादी टालनी पड़ी। “लव जिहाद” जैसे आरोपों ने निजी निर्णयों को भी सार्वजनिक अभियोग में बदल दिया।
क्या अब यह भी तय होगा कि किससे प्यार करें, किससे शादी करें? अगर सामाजिक निगरानी और धमकियाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हावी हों, तो संविधान प्रदत्त अधिकारों का क्या अर्थ रह जाता है?
ट्रेन में पिटाई से लेकर इनाम की घोषणा तक
कई घटनाओं में चलती ट्रेन में पहचान के आधार पर मारपीट, दाढ़ी खींचना, टोपी उतारना—ये सब दर्ज हुआ। कोटद्वार के दीपक कुमार का मामला भी चर्चा में रहा, जहाँ एक बुजुर्ग मुस्लिम की मदद करने पर उन्हें धमकियाँ मिलने का आरोप लगा। खुलेआम “इनाम” घोषित करने के वीडियो भी वायरल हुए।
यदि धमकी देने वाले खुद वीडियो डालें और उन्हें कानून का भय न हो, तो यह कानून-व्यवस्था की चुनौती है। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है—राज्य की निष्पक्षता और नागरिक की समान सुरक्षा।
नफरत का सामाजिक मनोविज्ञान
एक वायरल वीडियो में आठ साल के मुस्लिम बच्चे को “अपवित्र” कहकर निशाना बनाया गया। यह दृश्य सिर्फ एक बच्चे का नहीं, समाज के मनोविज्ञान का आईना है। नफरत का बीज जब बचपन तक पहुँच जाए, तो भविष्य कैसा होगा?
इतिहास बताता है कि घृणा-राजनीति का अंत समाज को लंबे समय तक शर्म और पछतावे में धकेल देता है—जैसा कि एडोल्फ हिटलर के दौर के बाद जर्मनी में हुआ। सवाल है: क्या हम वही गलती दोहराना चाहते हैं?
निष्कर्ष: क्या किया जाए?
- कानून का निष्पक्ष और दृश्यमान पालन – भीड़ हिंसा और धमकियों पर त्वरित कार्रवाई।
- राजनीतिक जवाबदेही – उग्र भाषा और प्रतीकों से दूरी।
- शैक्षणिक स्वतंत्रता की रक्षा – विश्वविद्यालयों में असहमति की सुरक्षा।
- नागरिक समाज की पहल – संवाद, कानूनी सहायता और तथ्य-आधारित विमर्श।
नफरत का जवाब सिर्फ नैतिक अपील से नहीं, संस्थागत दृढ़ता और नागरिक साहस से भी देना होगा। सवाल आपसे है—इन घटनाओं पर आपका नजरिया क्या है? लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए आप क्या कदम जरूरी मानते हैं?
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