February 20, 2026 4:11 am
Home » देशकाल » आजीविका, राजनीति और ‘हिंदुत्व एजेंडा’ की बहस

आजीविका, राजनीति और ‘हिंदुत्व एजेंडा’ की बहस

बिहार सरकार ने खुले में मांस-मछली बिक्री पर रोक लगाई। जानिए नियम, जुर्माना, आजीविका पर असर और इस फैसले पर राजनीतिक विवाद।

अब आम बिहारियों के लिए मीट-मछली खाना बनाया नीतीश कुमार ने मुश्किल!

बिहार सरकार के एक फैसले ने राज्य की राजनीति और सामाजिक जीवन में नई बहस छेड़ दी है। विधान सभा में सरकार की ओर से घोषणा की गई कि अब राज्य में खुले में मांस और मछली बेचने पर प्रतिबंध रहेगा। नियमों के अनुसार, बिना लाइसेंस खुले में बिक्री करने वालों पर 5,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा। सरकार का कहना है कि यह कदम स्वच्छता और नियमन के लिए है, लेकिन विपक्ष और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि इसके पीछे राजनीतिक और सांस्कृतिक एजेंडा काम कर रहा है।

क्या है सरकार का नया नियम?

विधान सभा में की गई घोषणा के अनुसार—

  • अब मांस और मछली की खुले में बिक्री प्रतिबंधित होगी
  • केवल लाइसेंस प्राप्त दुकानदार ही बिक्री कर सकेंगे
  • उल्लंघन करने पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा
  • स्थानीय निकायों को इस पर निगरानी की जिम्मेदारी दी जाएगी

सरकार इस फैसले को शहरी स्वच्छता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा से जोड़कर देख रही है।

आजीविका पर असर की आशंका

बिहार में मछली और मांस की बिक्री केवल व्यापार नहीं, बल्कि लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी का साधन है। राज्य की नदियों और तालाबों से मछली पकड़कर छोटे विक्रेता गली-मुहल्लों में ताज़ी मछली बेचते हैं।

  • बड़ी संख्या में गरीब और पिछड़े समुदाय इस काम से जुड़े हैं
  • अधिकांश छोटे विक्रेताओं के पास स्थायी दुकान या लाइसेंस नहीं होता
  • लाइसेंस व्यवस्था और जुर्माने का प्रावधान उनकी आय पर सीधा असर डाल सकता है

स्थानीय स्तर पर आशंका जताई जा रही है कि इससे छोटे कारोबारियों का पारंपरिक रोजगार प्रभावित होगा।

राजनीतिक समर्थन और विरोध

इस फैसले को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी भी तेज हो गई है। केंद्रीय मंत्री Giriraj Singh ने इस तरह के कदमों का समर्थन करते हुए इसे व्यवस्था और अनुशासन से जोड़कर देखा।

वहीं विपक्ष का आरोप है कि यह केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि सांस्कृतिक-राजनीतिक हस्तक्षेप है। भाकपा (माले) के महासचिव Dipankar Bhattacharya ने कहा कि यह निर्णय गरीबों की आजीविका और खान-पान की स्वतंत्रता पर हमला है और बिहार की सामाजिक संरचना इसे स्वीकार नहीं करेगी।

क्या यह चुनावी राजनीति से जुड़ा मुद्दा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में आगामी चुनावों को देखते हुए सांस्कृतिक और पहचान आधारित मुद्दों को उभारने की कोशिश हो सकती है। आलोचकों का कहना है कि राज्य में बेरोज़गारी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी सवालों के बीच इस तरह के फैसले सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ा सकते हैं।

सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ

बिहार में मछली और मांस का उपभोग व्यापक है और यह कई समुदायों की भोजन परंपरा का हिस्सा है। ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में ताज़ी मछली की खुले में बिक्री एक सामान्य और पारंपरिक व्यवस्था रही है। ऐसे में अचानक नियमन से सामाजिक असंतोष बढ़ने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा।

बड़ा सवाल

यह विवाद अब तीन बड़े सवालों के इर्द-गिर्द घूम रहा है—

  1. क्या यह कदम स्वच्छता सुधार का प्रयास है या सांस्कृतिक हस्तक्षेप?
  2. क्या सरकार छोटे विक्रेताओं के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करेगी?
  3. क्या यह फैसला आजीविका और खाद्य स्वतंत्रता के अधिकार को प्रभावित करेगा?

आने वाले समय में इस मुद्दे पर प्रशासनिक कार्रवाई, लाइसेंस प्रक्रिया और राजनीतिक प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि यह फैसला व्यावहारिक सुधार साबित होता है या एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक विवाद का कारण बनता है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

Read more
View all posts

ताजा खबर