संवैधानिक सुधारों पर जनमत और भारत के लिए नई कूटनीतिक चुनौती
बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव सामने आया है। 299 सदस्यीय संसद के चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने लगभग 212 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है। करीब दो दशक बाद बीएनपी फिर से सरकार बनाने जा रही है। यह चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक माना जा रहा है—यह 15 वर्षों से अधिक समय तक चले शेख हसीना के शासन और 2024 के व्यापक जनविरोध व सत्ता परिवर्तन की उथल-पुथल के बाद हुआ पहला आम चुनाव है।
अब साफ हो गया है कि नई सरकार बीएनपी के नेतृत्व में बनेगी और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाल सकते हैं।
क्या जमात को जनता ने नकार दिया?
इस चुनाव में कट्टरपंथी इस्लामी दल जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश को लेकर भी व्यापक चर्चा रही। बीएनपी की प्रचंड जीत के बावजूद यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि जनता ने जमात को पूरी तरह खारिज कर दिया है। जमात और उसके सहयोगियों ने भी कई सीटें हासिल की हैं।
यह परिणाम संकेत देता है कि बांग्लादेश की राजनीति में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद और इस्लामी राजनीति के बीच खींचतान अभी खत्म नहीं हुई है, बल्कि नए संतुलन की तलाश जारी है।
शेख हसीना की अनुपस्थिति और चुनावी वैधता पर सवाल
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी इस चुनाव में भाग नहीं ले सकी। वे फिलहाल भारत में हैं और चुनाव को अवैध बताते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की अपील कर चुकी हैं।
बीएनपी और अंतरिम सरकार पहले ही उनके प्रत्यर्पण की मांग उठा चुके हैं। ऐसे में नई सरकार के गठन के बाद यह सवाल और तीखा हो सकता है कि शेख हसीना को लेकर ढाका का रुख क्या होगा।
यह स्थिति भारत के लिए भी कूटनीतिक चुनौती बन सकती है, क्योंकि हसीना का भारत में रहना और ढाका की संभावित मांगें नई दिल्ली को असहज स्थिति में डाल सकती हैं।
संवैधानिक सुधारों पर जनमत: 70% से अधिक समर्थन
इन चुनावों के साथ देशव्यापी जनमत-संग्रह भी कराया गया, जिसमें मतदाताओं ने संविधान में व्यापक सुधारों के प्रस्तावों को 70% से अधिक समर्थन दिया।
यह संकेत है कि जनता सिर्फ सरकार बदलना नहीं चाहती, बल्कि शासन व्यवस्था में संरचनात्मक बदलाव की अपेक्षा रखती है—चाहे वह चुनावी प्रणाली हो, कार्यपालिका की शक्तियां हों या न्यायिक स्वतंत्रता।
भारत-बांग्लादेश संबंध: नए समीकरण की शुरुआत?
बीएनपी और भारत के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से बहुत सहज नहीं रहे हैं। अतीत में दोनों के बीच अविश्वास की स्थिति रही है। हालांकि खालिदा जिया के निधन पर भारत ने गहरा शोक व्यक्त किया था और विदेश मंत्री एस. जयशंकर को अंतिम संस्कार में प्रतिनिधि के रूप में भेजा था।
बीएनपी की जीत पर भारत ने औपचारिक और दोस्ताना प्रतिक्रिया दी है। लेकिन असली परीक्षा आगे होगी। प्रमुख मुद्दे होंगे:
- शेख हसीना का भारत में रहना और संभावित प्रत्यर्पण
- अवैध प्रवासन/घुसपैठ का मुद्दा, जिसे भारत में चुनावी राजनीति में बार-बार उठाया जाता है
- बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, जिसे भारत की सत्ताधारी पार्टी चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाती रही है
नई ढाका सरकार इन मुद्दों पर किस तरह का संतुलन साधती है, यह द्विपक्षीय संबंधों की दिशा तय करेगा।
क्षेत्रीय संतुलन: चीन और पाकिस्तान की भूमिका
बांग्लादेश दक्षिण एशिया की रणनीतिक राजनीति में अहम भूमिका निभाता है। चीन के साथ उसके आर्थिक और अवसंरचनात्मक संबंध पहले से मजबूत हैं, वहीं पाकिस्तान के साथ ऐतिहासिक जटिलताएं मौजूद हैं।
बीएनपी की सरकार इन संबंधों को किस दिशा में ले जाती है—क्या वह संतुलन की नीति अपनाएगी या किसी एक ध्रुव की ओर झुकेगी—यह दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय राजनीति और भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं पर असर डालेगा।
क्या यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन है या राजनीतिक पुनर्संरचना?
इन चुनावों को सिर्फ सरकार बदलने की घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता।
- लंबे एकदलीय वर्चस्व के बाद सत्ता परिवर्तन
- संवैधानिक सुधारों पर व्यापक जनसमर्थन
- निर्वासन में बैठी पूर्व प्रधानमंत्री
- क्षेत्रीय कूटनीतिक असमंजस
ये सभी संकेत देते हैं कि बांग्लादेश एक राजनीतिक पुनर्संरचना के दौर में प्रवेश कर चुका है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या बीएनपी लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ेगी, या सत्ता का केंद्रीकरण किसी नए रूप में लौटेगा?
