नसीर ने सच बोला तो क्यों बिलबिलाने लगे नफ़रती चिंटू और गोदी मीडिया!
“ये वो भारत नहीं है, जिसमें मैं बड़ा हुआ… जहाँ नफ़रत अब पूरे दिन चलने वाली प्रक्रिया बन चुकी है।”
यह शब्द किसी सामान्य व्यक्ति के नहीं, बल्कि भारतीय रंगमंच और सिनेमा के उस कलाकार के हैं, जिसने कई पीढ़ियों को अभिनय का अर्थ सिखाया, जिसने मिर्ज़ा ग़ालिब के किरदार के जरिए उर्दू अदब को घर-घर पहुँचाया, और जिसने अपने काम से यह साबित किया कि कला की कोई सरहद नहीं होती — वे हैं नसीरुद्दीन शाह।
लेकिन आज वही नसीरुद्दीन शाह एक ऐसे दौर में खड़े हैं, जहाँ सवाल पूछना देशद्रोह माना जाने लगा है। जहाँ कलाकार से उम्मीद की जाती है कि वह सिर्फ़ ताली बजाए, सत्ता की तारीफ़ करे, और चुप रहे। जहाँ नागरिक से अपेक्षा है कि वह नागरिक कम, भक्त अधिक बने।
नसीर साहब की पीड़ा सिर्फ़ उनकी निजी पीड़ा नहीं है। यह उस भारत की पीड़ा है, जो धीरे-धीरे अपने ही लोकतांत्रिक मूल्यों से दूर होता जा रहा है।
सवाल पूछना कब से देशद्रोह हो गया?
नसीरुद्दीन शाह पूछते हैं — “क्या सवाल पूछना ही देशद्रोह बन गया है?”
और आज के माहौल में इसका जवाब दुखद है — हाँ।
आज सवाल पूछना ही देशद्रोह है।
- अगर आप भीड़ की हिंसा पर सवाल उठाते हैं — आप देशद्रोही हैं।
- अगर आप अल्पसंख्यकों के अधिकार की बात करते हैं — आप देशद्रोही हैं।
- अगर आप सरकार की नीतियों पर सवाल करते हैं — आप देशद्रोही हैं।
- अगर आप संविधान की बात करते हैं — आप देशद्रोही हैं।
देशद्रोह की परिभाषा अब संविधान से नहीं, सत्ता की असुविधा से तय हो रही है।
कलाकार की सबसे बड़ी ‘गलती’
नसीरुद्दीन शाह की सबसे बड़ी ‘गलती’ क्या है?
उन्होंने कभी खुद को “विश्वगुरु” कहने वालों की जय-जयकार नहीं की।
उन्होंने कभी सत्ता के आगे झुककर अपनी अंतरात्मा नहीं बेची।
उन्होंने कला को सत्ता की दासी नहीं बनने दिया।
यही वजह है कि उनकी उपलब्धियों के बावजूद आज उन्हें निशाने पर लिया जाता है। वही कलाकार, जिनकी वजह से एक पूरी पीढ़ी ने उर्दू को जाना, मिर्ज़ा ग़ालिब को पहचाना — आज उन्हें यह तक कहा जाता है कि उन्हें उर्दू में बोलने का हक़ नहीं!
यह विडंबना नहीं, बल्कि एक संगठित मानसिकता का परिणाम है।
नफ़रत का सामान्यीकरण
नसीर साहब जिस “नफ़रत” की बात कर रहे हैं, वह कोई भावनात्मक टिप्पणी नहीं है। यह एक सामाजिक सच्चाई है।
आज:
- टीवी डिबेट नफ़रत का मंच बन चुके हैं।
- सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी का अखाड़ा है।
- इतिहास को नफ़रत के चश्मे से पढ़ाया जा रहा है।
- नागरिकता को धर्म से तौला जा रहा है।
नफ़रत अब अपवाद नहीं, नॉर्मल हो चुकी है।
और इस नफ़रत का सबसे बड़ा शिकार वही लोग होते हैं, जो सवाल पूछते हैं — लेखक, कलाकार, पत्रकार, छात्र, प्रोफ़ेसर।
उर्दू, ग़ालिब और सांस्कृतिक विरासत पर हमला
नसीरुद्दीन शाह का उर्दू में बोलना भी कुछ लोगों को खटकता है। क्योंकि उर्दू को एक भाषा नहीं, बल्कि एक पहचान से जोड़ दिया गया है।
यह वही देश है जहाँ उर्दू अदब, हिंदी साहित्य, संस्कृत दर्शन और तमिल काव्य — सब मिलकर भारतीय संस्कृति का निर्माण करते हैं। लेकिन आज उर्दू को संदेह की नज़र से देखा जाता है।
जिस कलाकार ने ग़ालिब को जीवंत कर दिया, आज उसे यह बताया जा रहा है कि उसे उर्दू में बोलने का अधिकार नहीं।
यह सिर्फ़ भाषा पर हमला नहीं है, यह भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत पर हमला है।
लोकतंत्र में असहमति का स्थान
लोकतंत्र सिर्फ़ चुनावों से नहीं चलता। लोकतंत्र असहमति से चलता है। सवालों से चलता है। आलोचना से चलता है।
अगर हर आलोचना को देशद्रोह और हर असहमति को राष्ट्रविरोधी बताया जाएगा, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदल जाएगा।
नसीरुद्दीन शाह की आवाज़ इसी लोकतांत्रिक स्पेस को बचाने की कोशिश है।
“ये वो भारत नहीं…”
यह वाक्य दरअसल एक चेतावनी है।
यह उस पीढ़ी की चेतावनी है, जिसने एक ऐसा भारत देखा था जहाँ विविधता को सम्मान मिलता था, जहाँ कलाकार को उसके विचारों के लिए नहीं, उसकी कला के लिए जाना जाता था, जहाँ सवाल पूछना नागरिक का अधिकार था, अपराध नहीं।
आज वह भारत बदल रहा है।
और इस बदलाव को सबसे पहले कलाकार, लेखक और विचारक महसूस करते हैं — क्योंकि वे समाज की नब्ज़ सबसे पहले पकड़ते हैं।
निष्कर्ष: नसीर साहब की बात हम सबकी बात है
नसीरुद्दीन शाह अकेले नहीं हैं। उनकी पीड़ा लाखों उन नागरिकों की पीड़ा है, जो चुप हैं, डरे हुए हैं, लेकिन भीतर से जानते हैं कि कुछ ग़लत हो रहा है।
आज ज़रूरत है यह कहने की —
सवाल पूछना देशद्रोह नहीं, लोकतंत्र का मूल है।
असहमति राष्ट्रविरोध नहीं, राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया है।
और शायद इसी साहस के साथ हमें यह भी कहना होगा —
हाँ नसीर साहब, आज सवाल पूछना ही देशद्रोह बना दिया गया है।
