पिछले कई सालों की तरह इस बार भी सेंधमारी, प्रावधानों में कटौती
हर साल एक संस्था बेहद जरूरी काम करती है — NCDHR (National Campaign on Dalit Human Rights)। यह संस्था केंद्रीय बजट को दलित और आदिवासी दृष्टिकोण से परखती है और बताती है कि कागजों में किए गए दावों के पीछे असलियत क्या है।
इसी क्रम में इस वर्ष जारी हुई रिपोर्ट है — DABA 2026-27 (Dalit Adivasi Budget Analysis)।
दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में NCDHR ने इस रिपोर्ट को जारी करते हुए बजट की परतें खोलीं। रिपोर्ट की पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि इस बजट में दलितों और आदिवासियों के लिए कोई ठोस या नई पहल दिखाई नहीं देती।
इससे भी अधिक गंभीर तथ्य यह है कि दलितों के लिए निर्धारित बजट में 43,207 करोड़ रुपये की कमी दर्ज की गई है।
आवंटन बनाम वास्तविक खर्च: सबसे बड़ा छल
कागजों में बड़ी राशि दिखाई देती है।
- अनुसूचित जातियों के नाम पर: ₹2,39,608 करोड़
- अनुसूचित जनजातियों के नाम पर: ₹1,39,261 करोड़
लेकिन DABA रिपोर्ट बताती है कि वास्तव में जो धनराशि सीधे लक्षित आबादी तक पहुंचती है, वह बेहद कम है:
- अनुसूचित जातियों के लिए वास्तविक लक्षित खर्च: ₹75,077 करोड़
- अनुसूचित जनजातियों के लिए वास्तविक लक्षित खर्च: ₹62,093 करोड़
यानी Allocation और Utilization (आवंटन और खर्च) के बीच एक गहरी खाई है। जो पैसा आवंटित दिखाया जाता है, वह ज़मीनी स्तर पर खर्च ही नहीं होता।
किन क्षेत्रों में बजट की अनदेखी?
DABA ने बजट को विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में बांटकर विश्लेषित किया, जैसे:
- शिक्षा
- सामाजिक सुरक्षा
- आजीविका
- न्याय तक पहुंच
- स्वच्छता और फ्रंटलाइन कर्मी
- जेंडर बजट
- दिव्यांग
- युवा रोजगार
- बच्चों के अधिकार
- भूमि अधिकार
- कृषि और जलवायु परिवर्तन
इन सभी क्षेत्रों में दलित-आदिवासी समुदायों के लिए कोई ठोस प्राथमिकता नहीं दिखती।
मैला ढोने से जुड़ी योजनाएं लगभग खत्म
रिपोर्ट में एक बेहद चिंताजनक तथ्य यह भी सामने आया कि मैनुअल स्कैवेंजिंग (मैला ढोना) से जुड़ी लगभग सभी योजनाएं हटा दी गई हैं। केवल नमस्ते योजना को जारी रखा गया है, जो मुख्य रूप से मशीनीकरण पर केंद्रित है, न कि उन लोगों के पुनर्वास और अधिकारों पर जो इस अमानवीय प्रथा से जुड़े रहे हैं।
NCDHR की प्रमुख मांगें
प्रेस कॉन्फ्रेंस में NCDHR ने सरकार के सामने कुछ महत्वपूर्ण मांगें रखीं:
- UGC के दिशा-निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, ताकि उच्च शिक्षा संस्थानों में दलित-आदिवासी छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को रोका जा सके।
- केंद्रीय स्पेशल कॉम्पोनेंट प्लान (SCP) और
- ट्राइबल सब प्लान (TSP) को कानूनी दर्जा देकर सख्ती से लागू किया जाए।
अब नजर सरकार पर
DABA 2026-27 एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि क्या बजट सिर्फ आंकड़ों का खेल बनकर रह गया है?
क्या सरकार दलित-आदिवासी समुदायों के अधिकारों और वास्तविक जरूरतों को गंभीरता से लेगी?
या फिर यह रिपोर्ट भी हर साल की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगी?
