January 28, 2026 5:27 pm
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नया भारतः क्रिसमस, चर्च और डर का माहौल

क्रिसमस के दौरान ईसाइयों पर बढ़ते हमले, ढेंकनाल की घटना, कंधमाल हिंसा से लेकर आज तक संघ संगठनों की भूमिका और धर्मांतरण के नैरेटिव की पड़ताल।

आरएसएस से जुड़े संगठनों द्वारा ईसाइयों पर लगातार बढ़ते हमले

भारत में ईसाई विरोधी हिंसा कोई नई बात नहीं है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में—और विशेषकर इस क्रिसमस के आसपास—जो घटनाएँ सामने आई हैं, वे एक नए और अधिक खतरनाक पैटर्न की ओर इशारा करती हैं। ताज़ा घटना 5 जनवरी को ओडिशा के ढेंकनाल में हुई, जहाँ पादरी बिपिन बिहारी को पकड़कर रस्सी से बाँधा गया, उनके मुँह में गोबर ठूँसा गया और लाठियों से पीटा गया। यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं था, बल्कि यह उस भय के वातावरण का प्रतीक है, जो संगठित तरीके से ईसाई समुदाय के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है।

क्रिसमस के दौरान देश के कई हिस्सों में बजरंग दल और उससे जुड़े संगठनों के कार्यकर्ताओं द्वारा सड़कों पर सांताक्लॉज की टोपी और सजावटी सामान बेचने वाले हॉकर्स को प्रताड़ित किया गया। उनकी दुकानों पर तोड़फोड़ हुई। कुछ जगहों पर चर्चों में घुसकर पादरियों को धमकाया गया। एक दिल दहला देने वाली घटना में एक दृष्टिबाधित महिला पर धर्मांतरण कराने का आरोप लगाकर उसे अपमानित किया गया।

इतिहास गवाह है: ग्राहम स्टेन्स से कंधमाल तक

ईसाइयों पर हिंसा की यह श्रृंखला नई नहीं है। सबसे भयावह घटनाओं में से एक थी पादरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो मासूम बच्चों को जिंदा जला देना। इस मामले में बजरंग दल से जुड़े दारा सिंह को सजा हुई। इसके बाद ओडिशा में 2006-07 के दौरान क्रिसमस के समय हमले बढ़े और 2008 में कंधमाल हिंसा में लगभग 70,000 ईसाइयों को अपने घर छोड़ने पड़े, लगभग 100 लोगों की हत्या हुई और सैकड़ों चर्चों को नुकसान पहुँचाया गया।

इससे पहले गुजरात के डांग क्षेत्र में भी इसी प्रकार की हिंसा हुई थी। हर बार आरोप एक ही लगाया गया—ईसाई मिशनरी धर्मांतरण कर रहे हैं।

धर्मांतरण का नैरेटिव बनाम जनगणना के तथ्य

धर्मांतरण का भय पैदा किया जाता है, लेकिन जनगणना के आँकड़े कुछ और कहते हैं।

  • 1971: 2.60%
  • 1981: 2.44%
  • 1991: 2.34%
  • 2001 और 2011: 2.30%

यदि बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हो रहा होता, तो ईसाइयों की आबादी घटती नहीं।

सेवा, शिक्षा और स्वास्थ्य का काम—और उसी पर हमला

दूरदराज़ इलाकों में काम करने वाले अधिकांश पादरी और मिशनरी शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा के क्षेत्र में काम करते हैं। संभव है कि कुछ लोग धर्मांतरण का कार्य भी करते हों, लेकिन उसकी संख्या नगण्य है। अधिकांश लोग उनके काम से प्रभावित होकर संपर्क में आते हैं।

2014 के बाद बढ़ती घटनाएँ: रिपोर्ट क्या कहती हैं

Citizens for Justice and Peace की रिपोर्ट के अनुसार 2014 से 2024 के बीच ईसाइयों पर हमलों में 500% वृद्धि हुई है।

  • 2014: 149 घटनाएँ
  • 2024: 834 घटनाएँ

Open Doors जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था ने भारत को ईसाई विरोधी हिंसा के कारण “Country of Particular Concern” की श्रेणी में रखा है।

‘धार्मिक स्वतंत्रता कानून’ या उत्पीड़न का औजार?

कई राज्यों में लाए गए ‘फ्रीडम ऑफ रिलीजन’ कानूनों का इस्तेमाल धर्मांतरण रोकने के नाम पर पादरियों और ईसाइयों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार है, वहाँ ऐसी घटनाएँ अपेक्षाकृत अधिक सामने आई हैं।

भारत में ईसाई धर्म: 2000 साल पुरानी उपस्थिति

ईसाई धर्म भारत में कोई बाहरी तत्व नहीं है। एडी 52 में सेंट थॉमस केरल के मालाबार तट पर आए थे। ईसाई धर्म की भारत में दो हजार साल पुरानी परंपरा है।

निष्कर्ष: डर से लोकतंत्र नहीं चलता

ईसाई समुदाय भी इस देश का उतना ही हिस्सा है जितना कोई अन्य धर्म। उनके साथ हो रही हिंसा केवल एक समुदाय पर हमला नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक और बहुलतावादी चरित्र पर हमला है।

राम पुनियानी

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