‘लिविंग डेड वोटर्स’ से लेकर तमिल अस्मिता तक, मोदी सरकार को खुली चुनौती
सिनेमा के पर्दे पर अपने अभिनय से जादू बिखेरने वाले कमल हासन जब राज्यसभा में अपना पहला भाषण देने के लिए खड़े हुए, तो वह केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक सजग नागरिक, एक राजनीतिक चेतना और लोकतंत्र के प्रहरी की तरह बोल रहे थे। उनका यह भाषण सिर्फ संसदीय औपचारिकता नहीं था, बल्कि एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप बन गया।
करीब बारह मिनट के अपने पहले भाषण में कमल हासन ने सीधे-सीधे चुनाव आयोग, केंद्र सरकार और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण तक पर सवाल खड़े किए। उन्होंने जिस भाषा और आत्मविश्वास से बात रखी, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि वह संसद में केवल उपस्थिति दर्ज कराने नहीं आए हैं, बल्कि लोकतंत्र के बुनियादी सवालों को उठाने आए हैं।
‘लिविंग डेड वोटर्स’ — लोकतंत्र पर सबसे बड़ा सवाल
कमल हासन ने अपने भाषण में ‘लिविंग डेड वोटर्स’ शब्द का प्रयोग करते हुए कहा कि देश में एक खतरनाक बीमारी फैलाई जा रही है। यह बीमारी है – जिंदा मतदाताओं को कागज़ों में मृत घोषित कर देना। उन्होंने विशेष रूप से ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) की प्रक्रिया का जिक्र करते हुए कहा कि इस प्रक्रिया के जरिए देशभर में हजारों-लाखों जीवित मतदाताओं को वोट देने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में ही लगभग एक करोड़ लोगों को ‘लिविंग डेड वोटर्स’ में बदल दिया गया है। यह केवल प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों पर चोट है। उनका सीधा सवाल था — “हम वोट डालना चाहते हैं, यह हमारा संवैधानिक अधिकार है, फिर हमें वोट डालने से क्यों रोका जा रहा है?”
यह बयान सीधे तौर पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा करता है।
निर्मला सीतारमण पर तंज और तमिल अस्मिता की बात
कमल हासन यहीं नहीं रुके। उन्होंने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर तीखा तंज कसते हुए तमिल भाषा के सम्मान का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा:
“तमिल भाषा भीख मांगने की भाषा नहीं है। आप अंग्रेजी या हिंदी में भीख मांग सकते हैं, लेकिन कोई तमिल में भीख नहीं मांगता।”
यह बयान उस टिप्पणी के संदर्भ में था जिसमें निर्मला सीतारमण ने कथित तौर पर तमिल को ‘भीख मांगने वाली भाषा’ कहा था। कमल हासन ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि तमिल समाज ने शिक्षा के लिए कटोरा उठाया था, भीख के लिए नहीं। उसी शिक्षा ने तमिल भाषा और संस्कृति को जीवित रखा है।
यह केवल भाषाई गौरव की बात नहीं थी, बल्कि दक्षिण भारत की सांस्कृतिक अस्मिता की एक स्पष्ट राजनीतिक अभिव्यक्ति थी।
अन्ना दुरई और गांधी की विरासत का हवाला
अपने भाषण में कमल हासन ने खुद को अन्ना दुरई और महात्मा गांधी का ‘ग्रेट ग्रैंड सन’ बताया। यह वंशावली जैविक से अधिक वैचारिक थी। वह यह बताना चाहते थे कि उनकी राजनीतिक सोच सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और नैतिक राजनीति की परंपरा से आती है।
यह संकेत साफ था — वह सत्ता से टकराने से पीछे हटने वाले नहीं हैं।
मोदी सरकार के लिए नया लोकतांत्रिक चैलेंज
कमल हासन का यह भाषण एक अभिनेता की लोकप्रियता से ज्यादा, एक सांसद की जिम्मेदारी का परिचय था। उन्होंने जिस स्पष्टता से वोट के अधिकार, चुनावी पारदर्शिता, भाषाई सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात की, वह मोदी सरकार के लिए एक वैचारिक चुनौती की तरह उभरा।
यह भाषण याद दिलाता है कि संसद केवल कानून बनाने की जगह नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ उठाने का मंच भी है।
कमल हासन ने अपने पहले ही भाषण में यह स्पष्ट कर दिया कि वह राज्यसभा में मौन दर्शक नहीं रहेंगे, बल्कि लोकतंत्र के उन सवालों को उठाएंगे जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है।
