February 10, 2026 4:45 am
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मोहन भागवत का हिंदुओं को नया टास्क, सब काम छोड़कर ढूंढो घुसपैठिया!

मोहन भागवत के भाषा के आधार पर घुसपैठियों की पहचान वाले बयान, लखनऊ के दावे और एआई निगरानी की चर्चा पर एक विश्लेषणात्मक लेख।

“घुसपैठियों की पहचान भाषा से?” – बयान, दावे और एक खतरनाक दिशा की ओर बढ़ता विमर्श

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयान ने एक बार फिर देश में “घुसपैठिया” शब्द को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। उनके वक्तव्य का सार यह था कि घुसपैठियों की पहचान भाषा और बोली से की जा सकती है, और समाज को इस पहचान के काम में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। यह विचार सुनने में जितना सरल लगता है, व्यवहार में उतना ही जटिल और खतरनाक सवाल खड़ा करता है।

इसी संदर्भ में लखनऊ की एक खबर भी सामने आई—जहां भाजपा के एक पदाधिकारी द्वारा शहर में “दो लाख घुसपैठियों” के होने का दावा किया गया, लेकिन पुलिस जांच में अब तक एक भी “बांग्लादेशी” या “रोहिंग्या” नहीं मिला। इसके बावजूद प्रशासन ने इस दावे की जांच में संसाधन लगाए। सवाल उठता है कि क्या इस तरह के दावे प्रशासनिक प्राथमिकताओं को प्रभावित कर रहे हैं?

नगर प्रशासन का काम शहर की बुनियादी समस्याओं—सफाई, पानी, सड़क, स्वास्थ्य—पर ध्यान देना होता है। लेकिन जब निर्वाचित प्रतिनिधि “घुसपैठिया खोज” जैसे अभियानों में उलझते हैं, तो यह चिंता स्वाभाविक है कि शासन की ऊर्जा किस दिशा में खर्च हो रही है।

मोहन भागवत के बयान में भाषा और बोली के आधार पर पहचान की बात कही गई। यह वही तर्क है जिसकी तकनीकी दिशा में कुछ संस्थानों में शोध की खबरें भी आई हैं—जहां कथित रूप से एआई (AI) टूल के माध्यम से भाषा के आधार पर पहचान की संभावना पर विचार हो रहा है। लेकिन भारत जैसे बहुभाषी और बहुबोली समाज में यह विचार कई बुनियादी प्रश्न खड़े करता है।

पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की सीमा से सटे इलाकों में रहने वाले लोगों की बांग्ला बोली में स्वाभाविक समानता है। एक ही भाषा की अनेक स्थानीय बोलियां होती हैं, जिनमें ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक कारणों से समानताएं पाई जाती हैं। ऐसे में क्या भाषा किसी की नागरिकता का प्रमाण बन सकती है? क्या एक बुज़ुर्ग की बोली उसे संदेह के घेरे में खड़ा कर देगी?

यह विमर्श केवल तकनीकी या प्रशासनिक नहीं है, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी है। जब समाज को “निगरानी” की भूमिका सौंपी जाती है, तो आशंका बढ़ती है कि आपसी अविश्वास, संदेह और पहचान के आधार पर उत्पीड़न की प्रवृत्ति बढ़ेगी। किसी को भी “घुसपैठिया” कह देना आसान हो सकता है, और इस आरोप से पैदा होने वाली परेशानी का बोझ आम नागरिक पर पड़ेगा।

आलोचकों का कहना है कि इस तरह का विमर्श सरकार की नीतिगत विफलताओं से ध्यान हटाकर एक अदृश्य “दुश्मन” की ओर मोड़ देता है। बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे सवालों की जगह “घुसपैठिया” सार्वजनिक चर्चा का विषय बन जाता है।

सबसे गंभीर चिंता तब पैदा होती है जब इस भाषा का इस्तेमाल किसी विशेष समुदाय की ओर संकेत करते हुए किया जाता है। इतिहास बताता है कि जब पहचान के आधार पर नागरिकों को संदेह की नजर से देखा जाने लगता है, तो लोकतांत्रिक समाज में भय और विभाजन गहराने लगता है।

भारत की ताकत उसकी विविधता है—भाषाओं, बोलियों, संस्कृतियों और समुदायों की विविधता। यदि भाषा ही संदेह का आधार बन जाए, तो यह विविधता ही सबसे पहले कठघरे में खड़ी होगी।

आज जरूरत इस बात की है कि सुरक्षा, नागरिकता और कानून के प्रश्नों पर ठोस, संवैधानिक और मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाए—न कि ऐसे सामान्यीकृत दावों के आधार पर, जो समाज में अविश्वास का वातावरण बनाते हैं। लोकतंत्र में सतर्कता जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है नागरिकों के अधिकारों और गरिमा की रक्षा।

मुकुल सरल

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