February 10, 2026 4:49 am
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नफ़रती CM हेमंत बिस्वा सरमा मुसलमानों पर गोलियां दागने पर उतरे

असम बीजेपी के आधिकारिक हैंडल से जारी ‘नो मर्सी’ वीडियो में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का मुस्लिम पर निशाना साधना—मीडिया चुप्पी, विपक्ष का विरोध और संवैधानिक सवाल।

असम बीजेपी का ‘नो मर्सी’ वीडियो: CM की बंदूक और PM की चुप्पी एक साथ दिखीं

देश जिस तेज़ी से नफ़रत की राजनीति की ओर धकेला जा रहा है, वह केवल अल्पसंख्यकों के लिए नहीं, पूरे भारत के लिए ख़तरे की घंटी है। हाल ही में असम बीजेपी के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से जारी एक वीडियो ने इसी ख़तरे को बेहद भयावह तरीके से सामने ला दिया। इस वीडियो में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को एक शिकारी की मुद्रा में “नो मर्सी” टैगलाइन के साथ एक मुस्लिम व्यक्ति पर पॉइंट-ब्लैंक गोली चलाते हुए दिखाया गया।

वीडियो कुछ ही देर में लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुँच गया। बाद में इसे डिलीट कर दिया गया, लेकिन तब तक उसका संदेश फैल चुका था।

सबसे विचलित करने वाली बात यह थी कि ठीक उसी समय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मलेशिया की आधिकारिक यात्रा पर थे और वहाँ के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के साथ गले मिलते, तस्वीरें खिंचवाते दिखाई दे रहे थे। एक तरफ़ अंतरराष्ट्रीय मंच पर मुस्लिम नेतृत्व के साथ सौहार्द का प्रदर्शन, और दूसरी तरफ़ उसी समय देश के एक मुख्यमंत्री का मुस्लिमों पर निशाना साधते हुए वीडियो—यह दृश्य अपने आप में गहरे विरोधाभास और राजनीतिक संदेश से भरा था।

यह कोई साधारण चुनावी विज्ञापन नहीं था। यह एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा धार्मिक पहचान के आधार पर हिंसा का प्रत्यक्ष दृश्यात्मक प्रदर्शन था। विपक्षी नेताओं, विशेषकर इमरान प्रतापगढ़ी और महुआ मोइत्रा ने इसे संविधान पर हमला बताया और सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की मांग की।

मीडिया की चुप्पी और सवाल

इतनी गंभीर सामग्री के बावजूद राष्ट्रीय मीडिया के बड़े हिस्से में इस पर लगभग सन्नाटा रहा। न प्राइम टाइम बहस, न मुखर संपादकीय। यह सवाल उठता है कि क्या नफ़रत के ऐसे दृश्य अब ‘सामान्य’ बना दिए गए हैं?

पत्रकार मनोज कुमार झा ने इस विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाया—जब प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय मंच पर सौहार्द की बात कर रहे हों और उसी समय उनके दल का मुख्यमंत्री धार्मिक हिंसा का दृश्य पेश करे, तो वैश्विक छवि पर उसका क्या असर पड़ता है?

नफ़रत की ‘प्रयोगशाला’ और चुनावी संदर्भ

असम लंबे समय से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति का केंद्र रहा है। पहले भी मुख्यमंत्री के बयान—“अगर बीजेपी नहीं आई तो असम मियालैंड बन जाएगा”, “मुसलमानों को तंग करना हमारा अधिकार है”—बहस का विषय रहे हैं। अब यह वीडियो उसी सोच का दृश्य रूप लगता है।

चुनाव नज़दीक हैं। ऐसे में इस तरह की सामग्री का जारी होना केवल संयोग नहीं माना जा सकता।

व्यापक पैटर्न: अन्य राज्यों की झलक

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के हालिया बयानों और घटनाओं का हवाला देते हुए यह भी देखा जा सकता है कि विभिन्न राज्यों में धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति किस तरह सार्वजनिक विमर्श पर हावी की जा रही है। “विराट हिंदू सम्मेलन” जैसे आयोजनों में प्रयुक्त प्रतीक, नारों और पोस्टरों में भी एक आक्रामक पहचान राजनीति स्पष्ट दिखती है।

संविधान बनाम बंदूक

सबसे बड़ा प्रश्न यही है: क्या यह राजनीति संविधान के मूल्यों—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता—के विपरीत खड़ी है?

जब एक निर्वाचित मुख्यमंत्री को बंदूक थामे, किसी विशेष समुदाय पर निशाना साधते दिखाया जाता है, तो यह केवल एक समुदाय नहीं, संवैधानिक व्यवस्था पर प्रतीकात्मक हमला प्रतीत होता है। यही कारण है कि कई आवाज़ें इसे महज़ राजनीतिक प्रचार नहीं, बल्कि गंभीर आपराधिक और नैतिक प्रश्न मान रही हैं।

निष्कर्ष

वीडियो हटाया जा सकता है, लेकिन उसके अर्थ और संदेश को हटाना संभव नहीं। यह घटना बताती है कि आज भारत में नफ़रत किस स्तर तक दृश्य और स्वीकार्य बनाई जा रही है, और इस पर संस्थाओं, मीडिया और राजनीतिक नेतृत्व की प्रतिक्रिया—या चुप्पी—इतनी ही महत्वपूर्ण है जितना स्वयं वह वीडियो।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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