फॉर्म-7 के जरिए दलित-मुसलमान वोटरों के नाम जमकर काटे जा रहे
उत्तर प्रदेश में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप यह है कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची में नाम जोड़ने से ज्यादा नाम काटने का औज़ार बनती जा रही है। विवाद इतना बढ़ चुका है कि दावे-आपत्तियों की तारीखें बार-बार बढ़ानी पड़ रही हैं।
अब एक बार फिर SIR की समयसीमा बढ़ा दी गई है।
दावे और आपत्तियों के निस्तारण की तारीख 6 फरवरी से 6 मार्च तक कर दी गई है, जबकि अंतिम मतदाता सूची 10 अप्रैल को जारी की जाएगी।
फॉर्म-7 क्या है और विवाद क्यों?
फॉर्म-7 वह आधिकारिक प्रपत्र है जिसका उपयोग मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए किया जाता है। नियमों के अनुसार:
- केवल रजिस्टर्ड मतदाता ही फॉर्म-7 भर सकता है
- फॉर्म में नाम हटाने का स्पष्ट कारण देना अनिवार्य है
- एक दिन में अधिकतम 10 फॉर्म-7 ही स्वीकार किए जा सकते हैं
- एक साथ बड़ी संख्या में फॉर्म स्वीकार नहीं किए जा सकते
यूपी के मुख्य चुनाव आयुक्त नवदीप रिणवा ने भी यही नियम दोहराए हैं।
लेकिन जमीनी हकीकत इन नियमों से मेल नहीं खाती दिख रही है।
अखिलेश यादव का आरोप: एक व्यक्ति, 100 से ज्यादा फॉर्म-7
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने दावा किया कि लखनऊ की सरोजिनी नगर विधानसभा क्षेत्र के एक गांव में एक ही व्यक्ति ने 100 से अधिक फॉर्म-7 भरकर लोगों के नाम कटवा दिए।
इस दावे की पड़ताल के लिए एक न्यूज़ टीम मौके पर पहुंची और पाया कि मामला काफी हद तक सही है। जिन लोगों के नाम काटे गए, उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम समुदाय की थी। आरोप यह भी है कि ये लोग न तो डुप्लीकेट वोटर थे, न मृत, और न ही स्थानांतरित—फिर भी उनके नाम सूची से गायब कर दिए गए।
दलित और मुस्लिम वोटरों को निशाना?
सपा के अन्य विधायकों ने भदोही सहित कई जिलों में आरोप लगाए हैं कि फॉर्म-7 का इस्तेमाल कर दलित और मुस्लिम वोटरों के नाम जानबूझकर हटाए जा रहे हैं।
कुछ बीएलओ (BLO) पर यह आरोप है कि उन पर राजनीतिक दबाव बनाया जा रहा है ताकि वे नाम काटने की प्रक्रिया तेज करें। एक बीएलओ की बातचीत भी सामने आई है जिसमें इस दबाव की ओर इशारा किया गया।
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर प्रश्न
चुनाव आयोग का काम है मतदाता सूची की पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना। लेकिन जब लगातार ऐसी शिकायतें सामने आती हैं, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं:
अगर सही और जीवित मतदाताओं के नाम इस तरह हटाए जा सकते हैं, तो आम नागरिक चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा कैसे करे?
SIR की प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है, लेकिन यदि यह प्रक्रिया चुनिंदा समुदायों के नाम हटाने का माध्यम बन जाए, तो यह लोकतांत्रिक ढांचे के लिए गंभीर संकेत है।
निष्कर्ष
यूपी में SIR अब केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बन चुकी है। फॉर्म-7 के दुरुपयोग के आरोप, बढ़ती समयसीमाएं, और जमीनी शिकायतें—ये सब चुनाव आयोग के सामने बड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं।
आख़िरकार, मतदाता सूची केवल कागज़ी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद है। यदि इसी पर भरोसा डगमगाने लगे, तो चुनाव की निष्पक्षता भी सवालों के घेरे में आ जाती है।
