February 12, 2026 4:51 am
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क्या भारत-अमेरिका ट्रेड डील में बांग्लादेश आगे निकल गया?

अमेरिका-बांग्लादेश डील से भारतीय टेक्सटाइल, कपास किसान और निर्यात पर दोहरा असर। जानिए कैसे 18% टैरिफ भारत को नुकसान में डाल रहा है।

मोदीजी के दोस्त ट्रंप का वार | टेक्सटाइल, कपास किसानों और भारत की संप्रभुता पर दोहरा असर

क्या आप जानते हैं कि हालिया अमेरिका-बांग्लादेश व्यापार समझौते ने भारत के टेक्सटाइल और कपास क्षेत्र पर गंभीर असर डाल दिया है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि जिस तरह की शर्तें बांग्लादेश को मिली हैं, वैसी छूट भारत को नहीं मिली। इसका परिणाम यह है कि जहां बांग्लादेश के गार्मेंट्स अमेरिकी बाजार में शून्य शुल्क (Zero Tariff) के साथ प्रवेश कर सकते हैं, वहीं भारत से जाने वाले कपड़ों पर 18% टैरिफ लगेगा।

यह अंतर सिर्फ व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरी आर्थिक श्रृंखला है जो सीधे भारत के कपास किसानों, सूत कातने वालों और टेक्सटाइल हब—सूरत, तिरुपुर और पानीपत—तक असर डालती है।

बांग्लादेश को क्या मिला, भारत को क्या नहीं?

अमेरिका-बांग्लादेश समझौते के तहत, यदि बांग्लादेश में तैयार गार्मेंट्स अमेरिकी कपास या मैन-मेड फाइबर से बने हैं, तो वे अमेरिका में शून्य टैरिफ पर प्रवेश करेंगे। जबकि भारत के लिए ऐसी कोई छूट नहीं है। भारत भले ही अमेरिका से कपास खरीदे, फिर भी उसके टेक्सटाइल उत्पादों पर 18% टैरिफ लगेगा।

यानी प्रतिस्पर्धा के मैदान में बांग्लादेश को एक ऐसी बढ़त मिल गई है, जो भारत को नुकसान में डालती है।

दोहरी मार: टेक्सटाइल और कपास दोनों पर

यह असर सिर्फ तैयार कपड़ों तक सीमित नहीं है।

अब तक बांग्लादेश अपनी लगभग 70% कपास भारत से खरीदता था। लेकिन इस समझौते के बाद बांग्लादेश सीधे अमेरिका से कपास खरीदेगा। इसका अर्थ है:

  • भारत के कपास किसानों का बड़ा बाजार खत्म
  • सूत उद्योग पर दबाव
  • टेक्सटाइल उद्योग की लागत बढ़ेगी
  • अमेरिकी बाजार में भारतीय कपड़े महंगे, बांग्लादेशी सस्ते

इस प्रकार भारत को दोहरी मार पड़ती है—एक ओर निर्यात पर टैरिफ, दूसरी ओर कच्चे माल के बड़े खरीदार का नुकसान।

आंकड़े क्या कहते हैं?

रिपोर्ट्स के अनुसार:

  • बांग्लादेश अमेरिका से लगभग 250 मिलियन डॉलर का कपास खरीदता है।
  • भारत भी अमेरिका से लगभग 200 मिलियन डॉलर का कपास खरीदता है।

इसके बावजूद, भारत को वह शून्य टैरिफ लाभ नहीं मिला जो बांग्लादेश को मिला।

टेक्सटाइल हब पर संकट

सूरत, तिरुपुर और पानीपत जैसे शहर भारत के टेक्सटाइल निर्यात के केंद्र हैं। इन इलाकों की अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर अमेरिकी बाजार पर निर्भर है। जब वहां भारतीय उत्पाद महंगे हो जाएंगे और बांग्लादेशी सस्ते, तो ऑर्डर स्वाभाविक रूप से बांग्लादेश की ओर शिफ्ट होंगे।

फैक्ट शीट और नई शर्तें

अमेरिका की ओर से जारी फैक्ट शीट में यह भी सामने आया है कि भारत अब अमेरिका से दालें और पशुओं का चारा (संभावित रूप से GM आधारित) भी खरीदेगा। इससे कृषि क्षेत्र में नई बहस खड़ी होती है।

साथ ही, अमेरिका ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह भारत की रूस से तेल खरीद पर निगरानी रखेगा। यदि अमेरिका को लगा कि भारत उसके निर्देशों से हटकर रूस से व्यापार कर रहा है, तो वह 25% अतिरिक्त टैरिफ लगा सकता है।

यह व्यापारिक शर्त से आगे बढ़कर कूटनीतिक और संप्रभुता के सवाल खड़े करता है।

बड़ा सवाल

यह सिर्फ एक ट्रेड डील नहीं रह जाती। यह सवाल उठाती है:

  • भारत को वैसी शर्तें क्यों नहीं मिलीं जैसी बांग्लादेश को मिलीं?
  • क्या भारत के टेक्सटाइल और कृषि हितों से समझौता हुआ?
  • क्या यह समझौता आर्थिक से अधिक राजनीतिक दबाव का परिणाम है?

स्पष्ट है कि इस समझौते का असर दूरगामी है—कपास खेतों से लेकर करघों तक और निर्यात बाजार से लेकर विदेशी नीति तक।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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