छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का विवादित फैसला: क्या न्याय की परिभाषा बदल रही है?
न्याय केवल कानून की धाराओं का तकनीकी अनुप्रयोग नहीं होता, वह समाज की संवेदनाओं, संविधान के मूल्यों और पीड़ित की गरिमा से भी जुड़ा होता है। लेकिन हाल ही में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के एक फैसले ने यही सवाल खड़ा कर दिया है—क्या न्याय की प्रक्रिया कहीं पीड़िता के दर्द को और गहरा तो नहीं कर रही?
यह मामला केवल एक सजा कम करने का नहीं है। यह उस सोच, उस न्यायिक दृष्टिकोण और उस संवेदनशीलता का सवाल है, जिसके आधार पर यौन हिंसा जैसे गंभीर अपराधों का आकलन किया जाता है।
क्या है पूरा मामला?
करीब 22 साल पुराने एक बलात्कार मामले में ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2005 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए 7 साल की सजा सुनाई थी।
लेकिन हाल ही में न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने इस सजा को घटाकर साढ़े तीन साल कर दिया।
फैसले में यह कहा गया कि:
- आरोपी द्वारा पीड़िता के निजी अंगों पर वीर्य स्खलन (ejaculation) हुआ,
- लेकिन “पूर्ण प्रवेश (penetration)” सिद्ध नहीं हुआ,
- इसलिए इसे बलात्कार की श्रेणी में पूर्ण रूप से नहीं माना जा सकता।
यही वह टिप्पणी है, जिसने व्यापक विवाद और आक्रोश को जन्म दिया है।
क्यों उठ रहे हैं गंभीर सवाल?
1. क्या “पूर्ण प्रवेश” ही बलात्कार की शर्त है?
भारतीय कानून और सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों में स्पष्ट किया गया है कि बलात्कार सिद्ध करने के लिए पूर्ण प्रवेश आवश्यक नहीं है। आंशिक प्रवेश भी पर्याप्त माना जाता है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि:
- क्या न्यायालय ने स्थापित कानूनी मानकों से अलग व्याख्या की?
- क्या तकनीकी तर्क के आधार पर अपराध की गंभीरता को कम कर दिया गया?
2. न्यायिक भाषा और पीड़िता की गरिमा
फैसले में जिस तरह घटना का विस्तृत और तकनीकी वर्णन किया गया, उसे लेकर भी आलोचना हो रही है।
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि:
- इस तरह की भाषा पीड़िता के पुनः मानसिक उत्पीड़न (secondary victimization) का कारण बन सकती है।
- न्यायालय की भाषा में संवेदनशीलता और गरिमा का संतुलन जरूरी है।
यौन हिंसा के मामलों में न्याय केवल सजा नहीं, बल्कि पीड़िता की गरिमा की पुनर्स्थापना भी होता है।
यह पहली बार नहीं
इससे पहले भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले पर विवाद हुआ था, जिसमें एक न्यायाधीश ने महिला का कपड़ा पकड़ना, नाड़ा खींचना और घसीटना जैसी घटनाओं को “बलात्कार का प्रयास” नहीं माना था।
बाद में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने हस्तक्षेप करते हुए स्पष्ट किया कि यह व्याख्या गलत थी और ऐसे कृत्य बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में आते हैं।
अब सवाल फिर वही है—क्या इस मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय हस्तक्षेप करेगा?
बड़ा सवाल: न्याय व्यवस्था में संवेदनशीलता का संकट?
यह विवाद कुछ गहरे सवाल उठाता है:
- क्या यौन हिंसा मामलों में न्यायिक प्रशिक्षण और संवेदनशीलता की जरूरत है?
- क्या तकनीकी व्याख्याएँ पीड़ित के अनुभव को कमतर कर रही हैं?
- क्या न्यायिक जवाबदेही की कोई प्रभावी व्यवस्था है?
- क्या ऐसी टिप्पणियाँ समाज में गलत संदेश नहीं देतीं?
न्यायालय संविधान के संरक्षक हैं, लेकिन जब फैसलों से महिला की गरिमा पर प्रश्न उठने लगें, तो लोकतांत्रिक समाज में बहस और जवाबदेही दोनों आवश्यक हो जाते हैं।
आगे क्या?
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि:
- क्या इस फैसले को चुनौती दी जाएगी?
- क्या सुप्रीम कोर्ट ऑफ India स्वतः संज्ञान लेगा?
- और सबसे महत्वपूर्ण—क्या न्याय व्यवस्था यौन अपराधों को देखने की अपनी संवेदनशीलता और भाषा की समीक्षा करेगी?
क्योंकि सवाल सिर्फ एक फैसले का नहीं है।
सवाल यह है—क्या न्याय पीड़िता के साथ खड़ा है, या कानून की तकनीकी व्याख्याओं में उसकी पीड़ा कहीं खोती जा रही है?
