गाज़ा के साये में मोदी की इस्राइल यात्रा: क्या भारत अपनी ऐतिहासिक नीति से दूर जा रहा है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25–26 फरवरी को प्रस्तावित इस्राइल दौरे ने भारत की विदेश नीति को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह दौरा ऐसे समय में सामने आया है, जब गाज़ा में जारी युद्ध, भारी नागरिक मौतों और मानवीय संकट को लेकर पूरी दुनिया में इस्राइल की कार्रवाई की कड़ी आलोचना हो रही है।
इस प्रस्तावित यात्रा की जानकारी सार्वजनिक रूप से इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की ओर से सामने आई, जिसने इस दौरे को और अधिक राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना दिया है।
भारत की ऐतिहासिक नीति: फिलिस्तीन के समर्थन से रणनीतिक चुप्पी तक
भारत दशकों तक फिलिस्तीन के अधिकारों का एक मजबूत समर्थक रहा है।
- भारत ने 1974 में फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) को मान्यता दी
- 1988 में फिलिस्तीन राज्य को औपचारिक मान्यता दी
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन और संयुक्त राष्ट्र में लगातार फिलिस्तीन के पक्ष में आवाज उठाई
लेकिन हाल के वर्षों में भारत का रुख बदलता हुआ दिखाई देता है। गाज़ा में जारी हमलों और भारी तबाही के बावजूद, भारत ने उन 85 देशों के संयुक्त बयान का समर्थन नहीं किया, जिन्होंने इस्राइल की सैन्य कार्रवाई और विस्तारवादी नीतियों पर चिंता जताई थी।
आलोचकों का कहना है कि यह बदलाव केवल कूटनीतिक संतुलन नहीं, बल्कि नैतिक स्थिति से पीछे हटने का संकेत है।
गाज़ा संकट और ‘रणनीतिक साझेदारी’ का सवाल
गाज़ा में अस्पतालों, स्कूलों और नागरिक बस्तियों पर हमलों तथा हजारों नागरिकों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों की मौत के बाद दुनिया भर में इसे गंभीर मानवीय संकट बताया जा रहा है। कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों और मानवाधिकार समूहों ने इस्राइल की कार्रवाई पर कड़े सवाल उठाए हैं।
ऐसे समय में प्रधानमंत्री मोदी का प्रस्तावित दौरा यह संदेश देता है कि:
- भारत इस्राइल के साथ अपने रक्षा और तकनीकी संबंधों को प्राथमिकता दे रहा है
- मानवीय संकट पर सार्वजनिक दबाव के बावजूद रणनीतिक साझेदारी कमजोर नहीं होगी
- विदेश नीति में नैतिकता की जगह व्यावहारिकता (realpolitik) हावी है
2017 की यात्रा और बदलती विदेश नीति
2017 में प्रधानमंत्री मोदी का इस्राइल दौरा ऐतिहासिक था। पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इस्राइल की स्वतंत्र यात्रा की, और जानबूझकर इसे फिलिस्तीन यात्रा से अलग रखा गया।
इसके बाद से:
- रक्षा सौदे और निगरानी तकनीक सहयोग बढ़ा
- कृषि, जल और स्टार्टअप क्षेत्रों में साझेदारी गहरी हुई
- उच्च-स्तरीय राजनीतिक रिश्ते लगातार मजबूत हुए
हालाँकि आलोचकों का कहना है कि इस प्रक्रिया में भारत की “फिलिस्तीन संतुलन नीति” कमजोर पड़ती गई।
वैश्विक दबाव, घरेलू राजनीति और पश्चिमी धुरी
भारत का रुख केवल इस्राइल तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका के साथ रणनीतिक निकटता भी बढ़ी है, खासकर डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान।
विश्लेषकों के अनुसार:
- भारत अब पश्चिमी रणनीतिक धुरी का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है
- इंडो-पैसिफिक से लेकर पश्चिम एशिया तक सुरक्षा सहयोग बढ़ा है
- लेकिन इसके साथ “रणनीतिक स्वायत्तता” पर सवाल भी उठे हैं
नैतिक विरासत बनाम रणनीतिक हित
भारत की विदेश नीति लंबे समय तक औपनिवेशिक विरोध, मानवाधिकार और वैश्विक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित रही है। फिलिस्तीन का समर्थन इसी विरासत का हिस्सा था।
आज सवाल यह है:
- क्या भारत अपने ऐतिहासिक नैतिक रुख से दूर जा रहा है?
- क्या गाज़ा जैसे मानवीय संकट पर चुप्पी उसकी वैश्विक छवि को प्रभावित करेगी?
- क्या रणनीतिक हितों के लिए नैतिक संतुलन को पीछे छोड़ा जा रहा है?
प्रधानमंत्री मोदी का प्रस्तावित इस्राइल दौरा अब केवल एक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की बदलती विदेश नीति की दिशा का प्रतीक बन गया है।
निष्कर्ष
गाज़ा में जारी तबाही और वैश्विक आक्रोश के बीच यह यात्रा भारत के सामने एक कठिन सवाल खड़ा करती है—क्या वह केवल रणनीतिक साझेदारियों की राजनीति करेगा, या अपनी ऐतिहासिक भूमिका के अनुरूप मानवीय और नैतिक संतुलन भी बनाए रखेगा?
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि भारत इस यात्रा के दौरान शांति, युद्धविराम और फिलिस्तीनी अधिकारों पर कोई ठोस पहल करता है या नहीं। फिलहाल, यह दौरा भारत की विदेश नीति के चरित्र और प्राथमिकताओं पर एक गंभीर बहस को जन्म दे चुका है।
