February 9, 2026 6:18 am
Home » देशकाल » सुप्रीम कोर्ट में वकील के रूप में उतरीं ममता, इतिहास बनाया

सुप्रीम कोर्ट में वकील के रूप में उतरीं ममता, इतिहास बनाया

पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट से नाम कटने के खिलाफ ममता बनर्जी खुद सुप्रीम कोर्ट में वकील बनकर उतरीं। चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल।

मतदाता अधिकार की लड़ाई में एक ‘स्ट्रीट फाइटर’ की नई मिसाल

वो शेरनी की तरह आईं। मोर्चे पर सीधे उतरीं। बैटिंग की, लड़ाई लड़ी और विजयी भाव से बाहर निकलीं। यह दृश्य पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का था, जो आज सुप्रीम कोर्ट में वकील के रूप में खड़ी थीं। मामला था पश्चिम बंगाल में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाता नामों की कटौती का।

ममता बनर्जी ने केवल अपने राज्य के लिए नहीं, बल्कि लोकतंत्र में मतदाता के बुनियादी अधिकार की रक्षा के लिए अदालत में हस्तक्षेप किया। उनका यह कदम भारतीय राजनीति में एक असाधारण दृश्य था—एक मुख्यमंत्री स्वयं वकील की तरह देश की सर्वोच्च अदालत में अपनी दलीलें रखती दिखीं।

चुनाव आयोग पर सीधे आरोप

ममता बनर्जी ने अदालत में आरोप लगाया कि चुनाव आयोग का रवैया निष्पक्ष नहीं है। उन्होंने तीखा तंज कसते हुए कहा कि जिस तरह से आयोग काम कर रहा है, वह “चुनाव आयोग नहीं, व्हाट्सऐप आयोग” जैसा व्यवहार प्रतीत होता है। उनका आरोप था कि पश्चिम बंगाल को निशाना बनाकर मतदाताओं के नाम मामूली स्पेलिंग गलतियों के आधार पर हटाए जा रहे हैं।

विशेष रूप से उन महिलाओं के नाम हटाए गए जो शादी के बाद दूसरे स्थान पर आईं और जिनके नाम या पते में मामूली बदलाव हुए। हजारों-लाखों लोग घंटों लाइन में लगकर अपने नाम ठीक कराने को मजबूर हैं, जिससे राज्य में अफरातफरी और भय का माहौल बना है।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने की। ममता बनर्जी के साथ वरिष्ठ वकील श्याम दीवान भी मौजूद थे। अदालत ने माना कि नामों में स्पेलिंग की गलतियां सामान्य बात हैं और चुनाव आयोग को इस आधार पर कठोर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार ऐसे अधिकारियों की मदद उपलब्ध कराए जो बंगाली नामों की वर्तनी और संरचना को सही ढंग से समझते हों, ताकि गलतियों को सुधारा जा सके, न कि नाम ही काट दिए जाएं।

चौंकाने वाले आंकड़े

अदालत में पेश किए गए आंकड़े बेहद गंभीर थे:

  • 32 लाख “unmapped voters” बताए गए
  • 1 करोड़ 36 लाख नाम मामूली स्पेलिंग या तकनीकी त्रुटियों के कारण हटाए गए

यह संख्या किसी प्रशासनिक चूक से अधिक एक व्यवस्थित संकट की ओर संकेत करती है। सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि क्या मतदाताओं को यह भी नहीं बताया जाना चाहिए कि उनका नाम क्यों हटाया गया?

एक राजनीतिक संदेश

यह केवल कानूनी लड़ाई नहीं थी, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी था। ममता बनर्जी, जिन्हें अक्सर “स्ट्रीट फाइटर” कहा जाता है, उन्होंने यह दिखाया कि लोकतांत्रिक लड़ाई केवल सड़क पर नहीं, अदालत के भीतर भी लड़ी जाती है।

उनका यह कदम विपक्षी दलों के लिए भी एक संकेत है कि यदि मतदाता अधिकार पर चोट हो रही है तो हर मंच—सड़क, संस्थान और अदालत—का इस्तेमाल जरूरी है।

क्या यह ऐतिहासिक क्षण है?

भारतीय राजनीति में शायद यह पहली बार है जब कोई मुख्यमंत्री स्वयं वकील की भूमिका में सुप्रीम कोर्ट में खड़ा दिखा। यह दृश्य प्रतीकात्मक भी था और व्यावहारिक भी। प्रतीकात्मक इसलिए कि यह लोकतंत्र में जनता के अधिकार की लड़ाई का संदेश देता है। व्यावहारिक इसलिए कि इससे अदालत का ध्यान उस प्रशासनिक प्रक्रिया की ओर गया, जो लाखों मतदाताओं को प्रभावित कर रही है।

अगली तारीख मिल चुकी है। अंतिम राहत क्या होगी, यह भविष्य बताएगा। लेकिन यह स्पष्ट है कि ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

Read more
View all posts

ताजा खबर