दुनिया में अशांति फैला रहे ट्रंप ने अपने चेलों को साथ लेकर बनाया शांति का बोर्ड!
“मुझे शांति का नोबेल चाहिए… चाहिए… चाहिए…”
इस राग को इतने सुरों में अलापने के बाद आखिरकार डोनाल्ड ट्रम्प ने समाधान खोज ही लिया—नोबेल नहीं मिला तो खुद का ‘Board of Peace’ बना लो।
दावोस की ठंडी वादियों में गरम भाषण देते हुए ट्रम्प ने दुनिया को बताया कि अब शांति का ठेका उन्होंने अपने हाथ में ले लिया है। फर्क बस इतना है कि यह शांति डंडे की ताकत, युद्ध की मार्केटिंग और बिजनेस की ब्रांडिंग के साथ आएगी।
शांति की घोषणा, अशांति की तैयारी
ट्रम्प का ‘Board of Peace’ सुनने में वैसा ही लगता है जैसे किसी हथियार कंपनी का नाम ‘कबूतर लिमिटेड’ रख दिया जाए।
घोषणा शांति की, इरादा विस्तार का।
ग्रीनलैंड पर उनकी नजरें अब भी टिकी हैं। वे कहते हैं — “अभी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर रहा हूँ”, यानी फिलहाल शब्दों से कब्ज़ा, बाद में तरीकों से। दुनिया जानती है कि ट्रम्प की “गंदी निगाह” जिस जमीन पर टिक जाए, वहां कूटनीति सिर्फ प्रस्तावना होती है, कहानी आगे कुछ और होती है।
संयुक्त राष्ट्र? वो क्या होता है?
ट्रम्प का यह बोर्ड दरअसल शांति से ज्यादा संयुक्त राष्ट्र के चैप्टर को क्लोज करने का प्रयोग लगता है।
एक साल के भीतर — 20 जनवरी 2025 से — उन्होंने राष्ट्रपति पद की गरिमा को रियलिटी शो में बदल दिया और अब विश्व राजनीति को स्टार्टअप मॉडल पर चला रहे हैं:
“एक अरब डॉलर दीजिए, ‘Board of Peace’ के पर्मानेंट मेंबर बन जाइए।”
शांति अब सब्सक्रिप्शन मॉडल पर है।
गाज़ा के नाम पर बोर्ड, गाज़ा का नाम गायब
सबसे दिलचस्प तथ्य यह कि यह बोर्ड गाज़ा के नाम पर लाया गया, लेकिन बोर्ड की भाषा में गाज़ा कहीं है ही नहीं।
नित्यानियाहू दावोस नहीं पहुँचे — गिरफ्तारी का डर था।
पर ट्रम्प पहुँचे — घोषणा का जोश था।
कौन दौड़ा, कौन रुका?
ट्रम्प ने सात देशों को न्योता भेजा।
यूरोपियन यूनियन, ब्रिटेन, फ्रांस — नाटो के बड़े साथी — इस ‘शांति’ से दूरी बनाए रहे।
पर कुछ देश ऐसे भी थे जो इस नए वर्ल्ड ऑर्डर की तुरही बजाने दावोस दौड़े चले आए।
ट्रम्प ने तो यहां तक कह दिया कि पुतिन भी शामिल होंगे, क्योंकि:
“वो भी ताकत हैं, और हमें ताकतवर लोग पसंद हैं।”
पुतिन ने जवाब दिया — “अभी हम स्टडी कर रहे हैं।”
मतलब, शांति भी अब ‘फाइल प्रोसेस’ में है।
भारत की दुविधा, पाकिस्तान की तस्वीर
भारत को भी न्योता मिला।
पर मोदी जी दावोस जाने का जोखिम नहीं उठा पाए।
क्योंकि एक तस्वीर बहुत भारी थी — पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ट्रम्प के बगल में बैठकर ‘Board of Peace’ पर दस्तखत करते हुए।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पुराने दोस्त ट्रम्प से दूरी, कूटनीतिक चुप्पी, और ‘पत्ते नहीं खोलना’ — भारत फिलहाल इसी मुद्रा में है।
बोर्ड ऑफ पीस या बोर्ड ऑफ डिक्टेटर्स?
अब सवाल हमारे सामने है — इसे क्या कहें?
- Board of Peace?
- Board of Dictators?
- Board of Vested Dirty Interests?
- या “ट्रम्प के केमिकल लोचे” का अंतरराष्ट्रीय संस्करण?
क्योंकि जहां शांति की बात हो और साथ में ग्रीनलैंड, गाज़ा, वेनेजुएला और एक अरब डॉलर की मेंबरशिप फीस जुड़ जाए — वहां शांति नहीं, शांति का बिजनेस मॉडल जन्म लेता है।
और ट्रम्प इस मॉडल के सीईओ हैं।
