दावोस में ‘अपने ही लोगों’ से डील: WEF के बहाने जनता के पैसों की खुली लूट
विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum – WEF) के नाम पर हर साल दावोस की बर्फीली वादियों में जो तमाशा लगता है, वह अब किसी से छिपा नहीं है। इस बार भी वही हुआ। भारतीय नेताओं और उद्योगपतियों का एक बड़ा जमावड़ा स्विट्ज़रलैंड के दावोस में दिखा, जहाँ कथित तौर पर निवेश लाने, विकास की योजनाएँ बनाने और भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयों पर ले जाने की बातें की जा रही हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि यह पूरा आयोजन ‘अपने ही लोगों’ के साथ डील करने और जनता के पैसों पर ऐश करने का मंच बन चुका है।
‘मोदी जी हैं तो मुमकिन है’—लूट भी, छूट भी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौर में एक जुमला खूब मशहूर हुआ— ‘मोदी है तो मुमकिन है’। दावोस में दिखा कि यह जुमला किस हद तक सच है। हमारे-आपके टैक्स के पैसे से नेता विदेश पहुँचते हैं, लग्ज़री होटलों में ठहरते हैं और वहीं बैठकर भारतीय उद्योगपतियों से MoU साइन करते हैं। सवाल यह है कि अगर डील भारत के ही उद्योगपतियों से करनी है, तो इसके लिए दावोस जाने की ज़रूरत क्या है?
देवेंद्र फडणवीस और ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, जिन्हें मोदी जी का खास चहेता माना जाता है, दावोस में जिस तरह के MoU साइन करते दिखे, उसने ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ की बहस को फिर से ज़िंदा कर दिया। बीजेपी के ही एक विधायक और मंत्री से जुड़ी कंपनी—लोढ़ा ग्रुप—के साथ दावोस में समझौता किया गया। सवाल सीधा है: क्या सत्ता में बैठे लोग अपने ही दल और अपने ही उद्योगपतियों को फायदा पहुँचाने के लिए जनता के पैसों का इस्तेमाल नहीं कर रहे?
मध्य प्रदेश: पानी नहीं, लेकिन टूरिज़्म प्लान ज़रूरी
मध्य प्रदेश में हाल ही में साफ पानी न मिलने से 25 लोगों की मौत हो गई। राज्य के कई इलाकों में बुनियादी सुविधाओं का संकट है। इसके बावजूद पूरा आला कमान दावोस पहुँच जाता है। वहाँ बैठकर विदेशी धरती पर यह सोच-विचार हो रहा है कि मध्य प्रदेश के टूरिज़्म को कैसे ‘विकसित’ किया जाए। जब जनता की जेब से पैसा कट ही रहा है, तो फिर दुख किस बात का—यही शायद इस राजनीति का मूल मंत्र है।
आंध्र प्रदेश और असम: दावोस में मुलाकात, भारत में दूरी
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा—दोनों दावोस में नज़र आए। विडंबना यह है कि मोदी राज में ये नेता भारत में भले ही एक-दूसरे से न मिल पाएं, लेकिन दावोस की ‘हसीन वादियों’ में बैठकर बिज़नेस डील करने जरूर पहुँच जाते हैं। यह दृश्य बताता है कि WEF अब वैश्विक आर्थिक मंच कम और भारतीय सत्ता-उद्योग गठजोड़ का एक्सक्लूसिव क्लब ज़्यादा बन चुका है।
झारखंड और टाटा: वही पुरानी कहानी
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी इस रेस में पीछे नहीं रहे। दावोस पहुँचकर उन्होंने टाटा इंडस्ट्री के साथ टाई-अप किया। सवाल फिर वही—क्या ऐसे समझौते भारत में, जनता की निगाहों के सामने नहीं हो सकते थे? या फिर दावोस की चमक-दमक ही इन डील्स को ‘वैध’ और ‘ग्लोबल’ बना देती है?
23 जनवरी तक चलेगा खेल
चिंता मत कीजिए—यह सब अभी खत्म नहीं हुआ है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 23 जनवरी तक चलेगा। यानी अभी और भी ‘लूट’ के नमूने सामने आने बाकी हैं। और ऐसा इसलिए संभव है क्योंकि इन सबको ऊपर से ग्रीन सिग्नल मिल चुका है।
असली सवाल
दावोस में साइन हुए इन MoU का बोझ अंततः किस पर पड़ेगा? जवाब साफ है—आम जनता पर। टैक्स, महँगाई और संसाधनों की कटौती के ज़रिए। WEF के मंच से विकास के जो सपने बेचे जा रहे हैं, उनकी कीमत जनता पहले ही चुका रही है।
यह दावोस मॉडल दरअसल विकास का नहीं, बल्कि सत्ता और पूंजी के गठजोड़ का मॉडल है—जहाँ जनता सिर्फ दर्शक है और उसका पैसा सिर्फ ईंधन।
