February 23, 2026 3:05 am
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Pax-Silica समझौता: क्या भारत के संसाधनों पर अमेरिकी रणनीति का दबाव!

भारत-अमेरिका Pax-Silica समझौते से क्या भारत के rare earth और silica संसाधनों पर अमेरिकी रणनीति का असर बढ़ेगा? समझें पूरी पड़ताल।

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अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बदलते समीकरणों के बीच भारत ने एक बार फिर ऐसा समझौता किया है, जिस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। AI और उभरती तकनीकों के दौर में rare earth और silica जैसे खनिजों का महत्व तेजी से बढ़ा है। इसी संदर्भ में भारत द्वारा Pax-Silica समझौते पर हस्ताक्षर को केवल एक तकनीकी या आर्थिक समझौता नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन की बड़ी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी व संसाधन आधारित प्रतिस्पर्धा चरम पर है, और इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा भारत, युद्धविराम और आर्थिक दबाव जैसे मुद्दों पर दिए गए बयान भी चर्चा में रहे।

AI समिट के दौरान हुआ समझौता

भारत में आयोजित India AI Impact Summit के दौरान, अमेरिकी राजदूत की मौजूदगी में Pax-Silica समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते के साथ भारत उन देशों के समूह में शामिल हो गया है, जो अमेरिका की उस रणनीति का हिस्सा हैं जिसका उद्देश्य चीन की तकनीकी और खनिज प्रभुत्व को चुनौती देना है।

दुनिया में rare earth खनिजों के उत्पादन और प्रोसेसिंग में चीन की हिस्सेदारी लगभग 90% तक मानी जाती है। यही वे खनिज हैं जिनके बिना:

  • मोबाइल फोन
  • लैपटॉप
  • सेमीकंडक्टर चिप
  • सैन्य उपकरण
  • AI हार्डवेयर

का निर्माण संभव नहीं है।

भारत क्यों अहम है?

वैश्विक स्तर पर rare earth संसाधनों की उपलब्धता में:

  • चीन – पहला स्थान
  • ब्राज़ील – दूसरा स्थान
  • भारत – तीसरा स्थान

भारत के तटीय राज्यों—केरल, तमिलनाडु और ओडिशा—में silica और अन्य दुर्लभ खनिजों के बड़े भंडार मौजूद हैं। Pax-Silica समझौते के बाद इन संसाधनों की आपूर्ति और उपयोग को लेकर अमेरिका की पहुंच बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि अमेरिका-चीन टेक और ट्रेड वॉर की रणनीति का हिस्सा है।

अमेरिका-चीन संघर्ष और भारत की भूमिका

दिसंबर में तैयार Pax-Silica ढांचे में अमेरिका ने स्पष्ट किया था कि वह उन देशों के साथ साझेदारी बढ़ाना चाहता है जहां rare earth संसाधन उपलब्ध हैं, ताकि:

  • AI प्रतिस्पर्धा में बढ़त मिले
  • रक्षा उत्पादन मजबूत हो
  • चीन पर निर्भरता कम की जा सके

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भारत इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा में एक रणनीतिक साझेदार है या एक संसाधन आपूर्ति केंद्र बनता जा रहा है।

कूटनीतिक संकेत और राजनीतिक सवाल

इसी दौरान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत-पाकिस्तान युद्धविराम को लेकर अमेरिकी भूमिका के दावे और पाकिस्तान नेतृत्व की प्रशंसा जैसे बयान भी सामने आए। इससे यह बहस और तेज हुई कि क्या आर्थिक और रणनीतिक समझौतों पर भारत पर दबाव बनाया जा रहा है।

प्रधानमंत्री Narendra Modi ने AI समिट में तकनीक के नैतिक उपयोग और डिजिटल संप्रभुता की बात की थी। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि Pax-Silica समझौता भारत के प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर बाहरी प्रभाव को बढ़ा सकता है।

असली चिंता क्या है?

इस समझौते को लेकर प्रमुख चिंताएँ हैं:

  1. क्या भारत के rare earth संसाधनों का नियंत्रण या प्राथमिक उपयोग विदेशी रणनीति के अनुसार होगा?
  2. क्या भारत अमेरिका-चीन संघर्ष में एक भू-राजनीतिक उपकरण बन सकता है?
  3. क्या इस समझौते की शर्तें पारदर्शी हैं?
  4. क्या इससे भारत की संसाधन संप्रभुता प्रभावित होगी?

निष्कर्ष

Pax-Silica समझौता केवल एक तकनीकी साझेदारी नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति राजनीति के उस दौर का संकेत है, जहां डेटा, AI और खनिज संसाधन ही नई भू-राजनीति का आधार बन रहे हैं। ऐसे समय में यह जरूरी है कि भारत अपने संसाधनों, रणनीतिक हितों और संप्रभुता के बीच संतुलन बनाए रखे।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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