मोदीजी का यह कैसा ‘लोक कल्याण’! पीएम आवास के पास से हटेंगे सैकड़ों ग़रीबों के घर
दिल्ली के वीवीआईपी इलाके में एक बार फिर विकास बनाम विस्थापन का सवाल खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री के आधिकारिक निवास 7, लोक कल्याण मार्ग के आसपास स्थित तीन झुग्गी बस्तियों—भैरम कैंप, मस्जिद कैंप और डी.आई.डी. कैंप—को हटाने का आदेश जारी किया गया है। प्रशासन ने इन बस्तियों में रहने वाले 700 से अधिक परिवारों को 6 मार्च तक जगह खाली करने को कहा है, अन्यथा कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब सरकार ‘सेवा’ और ‘लोक कल्याण’ की बात करती है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस ‘लोक कल्याण’ में शहर के सबसे गरीब और असुरक्षित नागरिक शामिल हैं?
700 से अधिक परिवारों पर बेघर होने का खतरा
सूत्रों के अनुसार, जिन तीन बस्तियों को हटाने का नोटिस दिया गया है, वे वर्षों से इस इलाके में बसी हुई हैं। इन बस्तियों में रहने वाले अधिकांश लोग दिहाड़ी मजदूर, घरेलू कामगार, रिक्शा चालक और अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़े श्रमिक हैं।
6 मार्च तक स्वयं हटने का आदेश दिया गया है। यदि परिवार निर्धारित समय तक नहीं हटते हैं, तो प्रशासन द्वारा बलपूर्वक हटाने की कार्रवाई की जा सकती है। इसका सीधा मतलब है—सैकड़ों परिवारों के सामने अचानक बेघर होने का संकट।
‘लोक कल्याण मार्ग’ और गरीबों की अनुपस्थिति
प्रधानमंत्री आवास जिस इलाके में स्थित है, उसका नाम पहले रेस कोर्स रोड था, जिसे बदलकर लोक कल्याण मार्ग रखा गया। नाम बदलने के साथ ‘लोक कल्याण’ की भावना पर जोर दिया गया, लेकिन अब आलोचकों का कहना है कि इसी इलाके से गरीबों को हटाया जा रहा है।
प्रश्न यह उठ रहा है कि क्या राजधानी के वीवीआईपी क्षेत्रों को “सौंदर्यीकरण” या “सुरक्षा” के नाम पर गरीबों से खाली किया जा रहा है? और यदि हाँ, तो इन परिवारों के पुनर्वास की क्या व्यवस्था है?
पुनर्वास पर अनिश्चितता
सबसे बड़ी चिंता यह है कि जिन परिवारों को हटाया जा रहा है, उनके पुनर्वास को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। दिल्ली में पहले भी कई बार झुग्गी हटाने की कार्रवाई बिना पर्याप्त पुनर्वास के की गई है, जिससे हजारों लोग बेघर होकर और भी असुरक्षित परिस्थितियों में पहुँच गए।
शहरी अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न नीतियों के तहत पुनर्वास के बिना बेदखली मानवीय संकट पैदा करती है।
‘विकास’ बनाम ‘विस्थापन’ की पुरानी बहस
दिल्ली में वीवीआईपी इलाकों, सड़क चौड़ीकरण, सुरक्षा व्यवस्था और सौंदर्यीकरण परियोजनाओं के नाम पर झुग्गी बस्तियों को हटाने की कार्रवाई नई नहीं है। लेकिन हर बार वही सवाल उठता है—क्या शहर को सुंदर बनाने की कीमत गरीबों को बेघर करके चुकाई जाएगी?
प्रधानमंत्री आवास के आसपास से इन बस्तियों को हटाने का फैसला इस बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है।
निष्कर्ष
6 मार्च की समय-सीमा नजदीक है और भैरम कैंप, मस्जिद कैंप और डी.आई.डी. कैंप के सैकड़ों परिवार अनिश्चितता में जी रहे हैं। ‘लोक कल्याण’ और ‘सेवा’ की राजनीतिक भाषा के बीच उनका सबसे बड़ा सवाल है—अब वे कहाँ जाएंगे?
जब विकास की योजनाएँ बनती हैं, तो क्या उनमें शहर के सबसे कमजोर नागरिकों के लिए भी जगह होती है—या राजधानी का नया चेहरा गरीबों की अनुपस्थिति से ही तैयार किया जा रहा है?
