सच बोलने की मिली सज़ा, मुस्लिम मतदाताओं के नाम काटे जाने का किया था खुलासा
असम में मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोपों के बीच एक नाम अचानक सुर्खियों में आया — सुमोना रहमान चौधरी। पेशे से शिक्षिका और निर्वाचन आयोग की बीएलओ (Booth Level Officer) के रूप में कार्यरत सुमोना ने जो तथ्य सामने रखे, उसके बाद असम प्रशासन की कार्रवाई ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सुमोना रहमान चौधरी को पहले बीएलओ के पद से हटाया गया और फिर उनकी शिक्षिका की नौकरी से भी निलंबित कर दिया गया। कारण छिपा नहीं है — उन्होंने वह सच सार्वजनिक कर दिया जो लंबे समय से ज़मीनी स्तर पर हो रहा था।
बिना जानकारी, बिना हस्ताक्षर — मुस्लिम मतदाताओं के नाम ‘मिसिंग’ कैसे?
सुमोना ने बताया कि जिस क्षेत्र की वे बीएलओ थीं, वहां उनकी जानकारी और सत्यापन के बिना बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं के नाम या तो मतदाता सूची से हटा दिए गए या उन्हें ‘मिसिंग’ दिखा दिया गया। यह दावा सिर्फ प्रशासनिक चूक का संकेत नहीं देता, बल्कि प्रक्रियागत धांधली की ओर इशारा करता है।
19 जनवरी को जब यह मामला सार्वजनिक हुआ, तभी आशंका जताई गई थी कि सुमोना को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। और हुआ भी वही।
मुख्यमंत्री के सार्वजनिक बयान और ज़मीनी कार्रवाई
असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा कई मंचों से सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि मुस्लिम मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काटे जाने चाहिए। उन्होंने तो यहां तक कहा कि चार से पांच लाख मुस्लिम नाम हटने चाहिए। ऐसे माहौल में, सुमोना का खुलासा प्रशासन के लिए असहज करने वाला था।
उनके खुलासे के बाद लगातार ऐसी खबरें सामने आने लगीं कि अलग-अलग इलाकों में बीएलओ स्तर पर मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया चल रही है।
क्या यह सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई है या व्हिसलब्लोअर पर प्रतिशोध?
सवाल यह है कि:
- क्या सुमोना पर हुई कार्रवाई सिर्फ ‘ड्यूटी में चूक’ का मामला है?
- या यह एक व्हिसलब्लोअर को सबक सिखाने की कार्रवाई है?
यदि एक बीएलओ यह कहती है कि उसके हस्ताक्षर और सत्यापन के बिना मतदाताओं के नाम हटाए गए, तो यह सीधे-सीधे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्न है।
मतदाता सूची से नाम काटना: लोकतंत्र के मूल पर प्रहार
मतदाता सूची लोकतंत्र की आधारशिला है। यदि किसी खास समुदाय के नाम लक्षित तरीके से हटाए जा रहे हों, तो यह न केवल प्रशासनिक अनियमितता है, बल्कि संवैधानिक अधिकारों का हनन भी है।
“स्टैंड विद सुमोना” — एक कर्मचारी नहीं, लोकतंत्र की आवाज़
सुमोना रहमान चौधरी का मामला अब सिर्फ एक कर्मचारी के निलंबन का मामला नहीं रह गया है। यह उस सवाल का प्रतीक है कि क्या भारत में चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाले सरकारी कर्मचारियों के लिए कोई सुरक्षा है?
सुमोना ने जो कहा, वह यदि सच है, तो यह सिर्फ असम नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चिंता का विषय है।
हम सुमोना के साथ खड़े हैं — क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ एक महिला कर्मचारी की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता की है।
