January 28, 2026 6:41 pm
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स्कूल बंद करके उसकी जगह गौशाला चाहिए इन्हें

दिल्ली के बुराड़ी में माउंट ऑलिवेट स्कूल के बाहर “स्कूल नहीं, गौशाला चाहिए” के नारे। शिक्षा संस्थानों पर बढ़ते हमलों और नफरत की राजनीति का विश्लेषण।

बुराड़ी के एक स्कूल पर ‘नफरत ब्रिगेड’ का हमला और शिक्षा पर संगठित हमला

दिल्ली के बुराड़ी इलाके में स्थित माउंट ऑलिवेट स्कूल के बाहर कुछ युवक नारे लगा रहे हैं — “हमें स्कूल नहीं, गौशाला चाहिए”, “हर-हर महादेव”। यह दृश्य सिर्फ एक स्थानीय विवाद नहीं है, बल्कि उस बड़े सामाजिक-राजनीतिक माहौल की तस्वीर है जहाँ शिक्षा जैसे बुनियादी अधिकार को भी नफरत की राजनीति के तराजू पर तौला जा रहा है।

ये युवक खुद को किसी “हिंदू ब्रिगेड” का हिस्सा बताते हैं। उनका उद्देश्य साफ है — स्कूल बंद कराओ, उसकी जगह गौशाला बनाओ। सवाल है: आखिर स्कूल क्यों खटक रहा है?

शिक्षा बनाम उन्माद: प्राथमिकताएँ बदलती क्यों दिख रही हैं?

एक लोकतांत्रिक समाज में स्कूल ज्ञान, संवाद और भविष्य की नींव होते हैं। लेकिन जब भीड़ यह तय करने लगे कि स्कूल की जगह क्या होना चाहिए, तो यह सिर्फ एक भवन का विवाद नहीं रहता, यह विचारों की दिशा का संकेत बन जाता है।

विडंबना यह है कि जिन राजनीतिक विचारों के नाम पर ये नारे लगाए जा रहे हैं, उन्हीं विचारधाराओं से जुड़े कई प्रभावशाली लोगों के बच्चे मिशनरी और प्रतिष्ठित निजी स्कूलों में पढ़ते हैं, विदेशों में शिक्षा लेते हैं और वैश्विक करियर बनाते हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर भीड़ को शिक्षा के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है।

नफरत का ‘नॉर्मलाइजेशन’

पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक जीवन में ऐसी घटनाएँ बढ़ी हैं जहाँ अल्पसंख्यक समुदायों को खुलेआम निशाना बनाया जाता है — सड़क किनारे सामान बेचने वाले छोटे दुकानदारों को डराना, कश्मीरी शॉल बेचने वालों से जबरन नारे लगवाना, या सोशल मीडिया पर हिंसक बयान देना। यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जहाँ उन्माद धीरे-धीरे सामान्य होता जाता है।

ऐसे ही उकसावे वाले बयानों के उदाहरण भी सामने आए हैं जहाँ खुले मंच से हिंसा की भाषा बोली जाती है। यह भाषा केवल शब्द नहीं होती, यह भीड़ के व्यवहार को दिशा देती है।

बुराड़ी की घटना: एक प्रतीक

माउंट ऑलिवेट स्कूल के बाहर लगे ये नारे एक प्रतीक हैं — यह शिक्षा बनाम उन्माद, संविधान बनाम भीड़, और भविष्य बनाम अतीत के बीच खड़े समाज की तस्वीर है। जब स्कूल को बंद कराने की मांग होती है, तो असल में बच्चों के भविष्य को बंद करने की मांग होती है।

सवाल जो बचते हैं

  • क्या भीड़ तय करेगी कि शहर में स्कूल रहेंगे या नहीं?
  • क्या शिक्षा संस्थानों को धार्मिक-राजनीतिक नारों के आधार पर निशाना बनाया जाएगा?
  • क्या यह प्रवृत्ति आने वाले समय में और स्कूलों, कॉलेजों और शिक्षण संस्थानों तक फैलेगी?

यह घटना सिर्फ बुराड़ी की नहीं है। यह उस सोच का आईना है जहाँ ज्ञान की जगह उन्माद को, और संवाद की जगह नारेबाज़ी को तरजीह दी जा रही है।

शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है। यदि वही भीड़ के निशाने पर है, तो यह चेतावनी है — केवल एक स्कूल के लिए नहीं, पूरे समाज के लिए।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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