January 28, 2026 6:39 pm
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कश्मीर में पत्रकारिता क्या बनती जा रही है अपराध?

कश्मीर में सीनियर पत्रकारों को बॉन्ड साइन कराने की कोशिश, पुलिस की हैरेसमेंट और मीडिया संस्थानों की चुप्पी पर सवाल।

अब तो नेशनल मीडिया के सीनियर पत्रकारों से भी बॉन्ड साइन कराने की कोशिश

कितनी शर्म और डर की बात है कि कश्मीर में आज सीनियर पत्रकारों को लगातार पुलिस थानों में बुलाया जा रहा है, उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है और उनसे जबरन ऐसे बॉन्ड साइन करवाने की कोशिश की जा रही है, जिनका सीधा मतलब है— कश्मीर में पुलिस की कार्यवाही पर रिपोर्ट मत करो, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को जगह मत दो।

यह कोई छोटे-मोटे या स्थानीय अख़बारों के पत्रकार नहीं हैं। यह देश के प्रतिष्ठित अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के सीनियर पत्रकार बशारत मसूद हैं, जो पिछले बीस सालों से—2006 से—इस अख़बार से जुड़े हुए हैं। इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर पुलिस ने उन्हें बार-बार बुलाया, उनसे कहा गया कि वे एक बॉन्ड पर साइन करें और यह स्वीकार करें कि उनसे “गलती” हो गई है।

लेकिन सवाल है— गलती किस बात की?
गलती सिर्फ इतनी कि उन्होंने अपना पेशा निभाया, अपनी ज़िम्मेदारी निभाई और एक रिपोर्ट प्रकाशित की।

“यह मेरी गलती नहीं, यह मेरा पेशा है”

बशारत मसूद ने साफ़ तौर पर द वायर को बताया कि उनसे कहा गया कि वे बॉन्ड साइन करें, यह मान लें कि उनसे गलती हो गई और वे ऐसी “गलती” दोबारा नहीं करेंगे। लेकिन उन्होंने यह बॉन्ड साइन करने से इनकार कर दिया।

उनका जवाब बेहद स्पष्ट था—

“यह मेरी गलती नहीं थी। यह मेरा पेशा था। यह मेरी ज़िम्मेदारी थी। यह मेरी रिपोर्ट थी।”

यही नहीं, हिंदुस्तान टाइम्स के पत्रकार आशिक़ हुसैन के साथ भी इसी तरह की कार्रवाई की गई। दोनों ही पत्रकारों ने—और शायद उन तमाम पत्रकारों ने जिन्हें बुलाया गया—इस बॉन्ड पर साइन करने से मना कर दिया।

बड़े मीडिया संस्थानों की चुप्पी क्यों?

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात है मीडिया संस्थानों की चुप्पी
इंडियन एक्सप्रेस जैसा अख़बार, अपने ही सीनियर रिपोर्टर के साथ हुए इस हैरेसमेंट, इस मानसिक प्रताड़ना पर अपने अख़बार में एक लाइन की खबर तक नहीं छापता

यह सवाल सिर्फ पुलिस की कार्रवाई का नहीं है, यह सवाल मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी का भी है। जब अपने ही पत्रकार के साथ अन्याय हो रहा हो, तब अगर संस्थान चुप हैं, तो यह चुप्पी भी सत्ता की भाषा बन जाती है।

राजनीतिक चुप्पी भी सवालों के घेरे में

यह मामला सिर्फ पत्रकारों तक सीमित नहीं है। सवाल राजनीतिक नेतृत्व की चुप्पी पर भी है।
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की चुप्पी पर भी सवाल उठ रहे हैं। इल्तिजा मुफ्ती ने साफ कहा है कि कम से कम उन्हें इस मुद्दे पर आवाज़ तो उठानी चाहिए थी।

जब ‘द वायर’ खड़ा हुआ था

दिसंबर में द वायर ने अपने पत्रकार जहांगीर अली के पक्ष में मजबूती से खड़े होकर दिखाया था कि पत्रकारिता संस्थान कैसे अपने रिपोर्टर के साथ खड़े हो सकते हैं। जहांगीर अली का फोन जिस तरह से जब्त किया गया था, उसके खिलाफ द वायर ने खुलकर सवाल उठाए।

यही साहस और एकजुटता बाकी मीडिया संस्थानों और पत्रकार संगठनों को भी दिखानी चाहिए।

डराने-धमकाने की नई रिवायत

यह कोई पहला मामला नहीं है।
कश्मीर टाइम्स की सीनियर पत्रकार अनुराधा भसीन के साथ भी पहले इसी तरह की रेड, डराने-धमकाने और दबाव की कार्रवाइयाँ हो चुकी हैं। धीरे-धीरे यह सब एक नई रिवायत बनती जा रही है।

मोदी सरकार के तथाकथित “न्यू इंडिया” में, कश्मीर पत्रकारिता के सबसे बड़े शिकारों में से एक बनता जा रहा है।

ऐसे में सबको कश्मीर के पत्रकारों के पक्ष में खुलकर खड़ा होना होगा। क्योंकि, अगर आज कश्मीर में रिपोर्टिंग को “गलती” बताया जा रहा है, तो कल यह देश के हर कोने में पत्रकारिता पर हमला होगा।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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