September 12, 2026 7:59 pm
Home » हाशिये की आवाज़ » चौक पर चर्चा: मुनस्‍मृति को मानने वालो चश्‍मा ज़रा बदल कर देखो

चौक पर चर्चा: मुनस्‍मृति को मानने वालो चश्‍मा ज़रा बदल कर देखो

मनुस्‍मृति है ही महिला विरोधी। उसमें महिलाओं को हमेशा गुलाम बनाए रखने की साजिश है। मनुस्‍मृति कहती है कि महिला को बचपन में पिता और भाई के अधीन रहना चाहिए। विवाह होने पर पति के अधीन और पति न रहने पर पुत्र के अधीन रहना चाहिए। मनुस्‍मृति की पितृसत्तात्‍मक व्‍यवस्‍था आज भी महिलाओं को गुलाम और दोयम दर्जे का नागरिक बनाए रखना चाहती

जो सज्‍जन मनुस्‍मृति को अपना धर्मग्रंथ बता रहे थे वह यह कहते हुए चले गए कि – ‘दिमागी नक्‍सलियों की यही पहचान है। ऐसे लोगों को पाकिस्‍तान चले जाना चाहिए।’

सुबह की सैर से लौटते हुए जब अपनी कॉलोनी के निकट चौक पर पहुंचा तो चाय पीने की तलब हुई। मैं चंदू चाय वाले की टपरी पर रुक गया। चाय का ऑर्डर दिया और वहीं खड़ा चाय की प्रतीक्षा करने लगा। यहां बिल्‍कुल नजदीक ही नंदू पान की दुकान भी है। कुछ लोग नंदू पान की दुकान से पान बीड़ी सिगरेट गुटखा आदि खरीद रहे थे। काम पर जाने वाले कुछ महिला पुरुष ई-रिक्‍शा का इंतजार कर रहे थे। कुछ लोग चंदू चाय की दुकान पर चाय पीते हुए बातें कर रहे थे।

मैं भी उनकी बातें सुनने लगा। एक सज्‍जन कह रहे थे – “ये जो राहुल गांधी है ये सनातन विरोधी है। इसे भारतीय सभ्‍यता-संस्‍कृति की समझ नहीं। इसने पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी और मोहन भागवत का मजाक उड़ाया। और सबसे बड़ी बात हमारे धर्मग्रंथ मनुस्‍मृति को महिला विरोधी बताया।”

स्‍कूल में पढ़ाने वाली शिक्षिका भी नजदीक ही खड़ी थी वह स्‍कूल जाने के लिए ई-रिक्‍शा का इंतजार कर रही थी। उन्होंने भी ये बातें सुनीं तो उनसे रहा नहीं गया। वह बोल पड़ीं- “राहुल गांधी ने कुछ गलत नहीं कहा। मनुस्‍मृति है ही महिला विरोधी। उसमें महिलाओं को हमेशा गुलाम बनाए रखने की साजिश है। मनुस्‍मृति कहती है कि महिला को बचपन में पिता और भाई के अधीन रहना चाहिए। विवाह होने पर पति के अधीन और पति न रहने पर पुत्र के अधीन रहना चाहिए। मनुस्‍मृति की पितृसत्तात्‍मक व्‍यवस्‍था आज भी महिलाओं को गुलाम और दोयम दर्जे का नागरिक बनाए रखना चाहती है।

मैंने कहा- “आप सही कह रही हैं। तुलसीदास ने भी रामचरित मानस में उसी मनुवादी व्‍यवस्‍था का समर्थन किया है जब वह कहते हैं –‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी।’ या फिर ‘जिमि स्‍वतंत्र भए बिगरहिं नारी’।

“आप ठीक कहते हैं भाई साहब।

उन शिक्षिका ने कहा। उनको गंतव्‍य की ओर जाने वाला रिक्‍शा मिल गया था और वह उस में बैठ कर चली गईं।

उनके जाने के बाद वहां खड़े एक व्‍यक्ति ने उन शिक्षिका पर टिप्‍पणी की- “ये औरतें चार अक्षर पढ़-लिख क्‍या गईं भूल गईं अपनी औकात कि पांव की…तभी तो इनके साथ दुष्‍कर्म होते हैं और सही होते हैं।” कहते हुए वह खिसक गया।

मेरी चाय आ गई थी मैं चाय पीने लगा।

जो सज्‍जन मनुस्‍मृति को अपना धर्मग्रंथ बता रहे थे वह यह कहते हुए चले गए कि – ‘दिमागी नक्‍सलियों की यही पहचान है। ऐसे लोगों को पाकिस्‍तान चले जाना चाहिए।’

वहीं चाय पी रहे एक सज्‍जन ने मेरा समर्थन करते हुए कहा– “मनुस्‍मृति ने शूद्रों वंचितों  के लिए भी हमेशा अपना गुलाम बनाए रखने की साजिश रच रखी है। मनुस्‍मृति कहती है कि शूद्रों का जन्‍म ही उच्‍चवर्ण की सेवा करने के लिए हुआ है। इसलिए आज भी उन्‍हें गांवों में एक दिशा विशेष की ओर कोने पर बसाया जाता है। मनुस्‍मृति कहती है कि शूद्रों के पास धन नहीं होना चाहिए। उन्‍हें अच्‍छा भोजन नहीं मिलना चाहिए। उन्‍हें उच्‍च वर्णों की जूठन खानी चाहिए। उन्‍हें अच्‍छे वस्‍त्र नहीं पहनने चाहिए। उनका घर और रहन-सहन सही नहीं होना चाहिए। और यदि शूद्रों के पास कहीं से धन आ भी जाए तो उनसे छीन लेना चाहिए। उन्‍हें शिक्षा प्राप्‍त करने का अवसर नहीं मिलना चाहिए। शिक्षा उनके लिए निषेध है। फिर भी कोई शूद्र पढ़ने का दुस्‍साहस करे तो उसे कठोर दंड दिया जाय। बताइए ये शूद्रों यानी पिछड़ों दलितों, आदिवासियों और वंचितों के साथ कितना बड़ा अन्‍याय है।

एक व्‍यक्ति ने नंदूपान की दुकान से सिगरेट खरीदी थी उसे लाइटर से सुलगाते हुए अपने साथी से कहा– “मनुस्‍मृति के प्रति ये नफरत फैलाने वाले लोग कौन हैं – हम जानते हैं। मनुस्‍मृति हमारा धर्मग्रंथ था, है, और हमेशा रहेगा। और सिर्फ धर्मग्रंथ ही नहीं बल्कि हमारा संविधान है ये।

इस पर उसके साथी ने कहा– “हां, लेकिन अब थोड़ा सावधान रहना होगा। मनुस्‍मृति की व्‍यवस्‍था इन्‍हें चाश्‍नी में मिलाकर देनी होगी।

वहीं खड़ा तीसरा व्यक्ति मुस्कुराया और व्यंग्य में बोला– “अच्छा, स्‍लो पॉयजन की तरह… तुम्हारा संघ यह काम बखूबी कर रहा है। चूंकि अब जमाना बदल रहा है। शूद्र-वंचित वर्ग को अब ज्‍यादा दिनों तक मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है। हां, धर्म सबकी कमजोर नस है। धर्म के नाम पर किसी को भी बरगलाया जा सकता है। स्‍कूल की घंटी सुनने के बजाय मंदिर की घंटी सुनने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। कांवड़ ढुलवाने के लिए प्रोत्‍साहित किया जा सकता है। हिंदू मुसलमान में नफरत फैलाने के लिए उकसाया जा सकता है। हिंसा, दंगा-फसाद करवाया जा सकता है। गरीब-वंचित लोगों को शिक्षा से हटा दो और धर्म की अफीम चटा दो। हमें साधन विहीन, गरीब, अशिक्षित बनाए रखने का प्रयास जारी रखो ताकि हम हमेशा तुम्हारे आगे दीन-हीन रहें। जैसे हमारे पूर्वज रहे। वरना तुम्हारा सदियों से चला आ रहा एकछत्र राज तहस नहस हो सकता है।

बहस तेज़ हो गई थी। मेरी चाय खत्‍म हो गई थी लेकिन मैं वहीं खड़े खड़े सोचने लगा– जैसे जैसे साज़िशें तेज़ हो रही हैं, प्रतिरोध भी तेज़ हो रहा है। अच्छा है…मुझे अपनी ही कविता की पंक्तियां याद आ गईं–

संविधान को पढ़ कर देखो

तुम भी नई पहल कर देखो

मनुस्‍मृति को मानने वालो

चश्‍मा जरा बदल कर देखो

राज वाल्मीकि

View all posts

तिरछी नजर

ताजा खबर