September 11, 2026 11:00 am
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‘बांग्लादेश भेजने से बेहतर है मुझे मार डालो’

पश्चिम बंगाल के 66 वर्षीय जलील अख्तर को पुलिस ने बांग्लादेशी बताते हुए हिरासत में लिया। परिवार के पास वोटर आईडी, पैन कार्ड और 1995 की वोटर लिस्ट समेत कई दस्तावेज़ हैं।

भारतीय दस्तावेज़ों के बावजूद हिरासत में 66 वर्षीय जलील अख्तर

पश्चिम बंगाल के 66 वर्षीय जलील अख्तर का परिवार दावा करता है कि उनके भारतीय होने के कई दस्तावेज़ मौजूद हैं। इसके बावजूद पुलिस ने उन्हें बांग्लादेशी घुसपैठिया बताते हुए हिरासत में लिया। अदालत में पुलिस ने उनके वोटर आईडी, पैन कार्ड और दूसरे दस्तावेज़ों को असली भारतीय दस्तावेज़ माना है। फिर भी उन्हें जमानत नहीं मिली है।

बांग्लादेश भेजने से बेहतर है कि मुझे मार डालो।

पश्चिम बंगाल के 66 वर्षीय जलील अख्तर के बारे में परिवार के अनुसार यह उनकी सबसे बड़ी चिंता है—एक ऐसे व्यक्ति के रूप में अपनी भारतीय पहचान साबित करना, जिसके पास भारतीय नागरिक होने के कई दस्तावेज़ मौजूद हैं।

सवाल यह है कि जब किसी व्यक्ति के पास मतदाता सूची में दशकों पुराना नाम हो, वोटर आईडी, पैन कार्ड, जमीन के दस्तावेज़ और पंचायत का स्थायी निवास प्रमाण पत्र हो, तो उसे बांग्लादेशी बताकर हिरासत में रखने का आधार क्या है?

रात में घर से उठाया गया

परिवार के अनुसार, 19-20 जून 2026 की रात डलखोला पुलिस जलील अख्तर को उनके घर से ले गई। परिवार को उनकी गिरफ्तारी की जानकारी अगली सुबह मिली।

पुलिस ने उन्हें कथित तौर पर बांग्लादेशी घुसपैठिया मानकर हिरासत में लिया। इसके बाद से जलील अख्तर जेल, डिटेंशन सेंटर या होल्डिंग सेंटर में हैं। परिवार के मुताबिक, उनकी हिरासत को करीब तीन महीने हो चुके हैं और अभी तक उन्हें जमानत नहीं मिली है।

परिवार को अब अगली सुनवाई का इंतजार है। 2 सितंबर 2026 को इस मामले पर अदालत में सुनवाई हुई थी और अगली सुनवाई 10 सितंबर को होने की बात कही गई थी।

‘अगर 2002 में भारत आए तो 1995 की वोटर लिस्ट में नाम कैसे?’

जलील अख्तर के मामले में सबसे बड़ा सवाल उनके कथित भारत आगमन की तारीख को लेकर है।

पुलिस की एफआईआर में दावा किया गया है कि जलील अख्तर करीब 24 साल पहले बांग्लादेश से भारत आए थे। पूछताछ के दौरान उनके द्वारा बांग्लादेश के एक जिले का निवासी होने की बात कहे जाने का भी पुलिस ने उल्लेख किया है।

लेकिन परिवार इस दावे पर सवाल उठाता है।

उनका कहना है कि अगर जलील अख्तर लगभग 2002 के आसपास भारत आए, तो उनका नाम 1995 की भारतीय मतदाता सूची में कैसे मौजूद है?

परिवार के पास उनके भारतीय होने के समर्थन में कई दस्तावेज़ होने की बात कही गई है। इनमें वोटर आईडी, पैन कार्ड, जमीन से जुड़े दस्तावेज़ और पंचायत का स्थायी निवास प्रमाण पत्र शामिल हैं। परिवार ने यह भी बताया है कि 2026 के चुनाव से जुड़ी वोटर स्लिप भी उन्होंने संभालकर रखी है।

1995, 2002 और 2026—तीन अलग-अलग रिकॉर्ड में नाम

मामले की सुनवाई के दौरान दस्तावेज़ों और पुराने रिकॉर्ड का मुद्दा भी सामने आया।

2 सितंबर को अदालत में पुलिस ने लिखित रूप में माना, परिवार के अनुसार, कि जलील अख्तर का वोटर आईडी और पैन कार्ड वास्तविक भारतीय दस्तावेज़ हैं। पुलिस ने यह भी माना कि उनका नाम 1995 की मतदाता सूची, 2002 की SIR और 2026 की SIR में मौजूद है।

यह स्वीकारोक्ति मामले को और महत्वपूर्ण बनाती है।

क्योंकि एक तरफ पुलिस का आरोप है कि जलील अख्तर लगभग 2002 में बांग्लादेश से भारत आए थे। दूसरी तरफ, उनका नाम 1995 की मतदाता सूची में मौजूद होने का दावा किया जा रहा है।

यानी विवाद सिर्फ दस्तावेज़ों का नहीं, बल्कि उनकी पूरी नागरिकता संबंधी टाइमलाइन का है।

1982 से रिकॉर्ड होने की बात, लेकिन उससे पहले के दस्तावेज़ मांगे गए

ट्रांसक्रिप्ट के मुताबिक, 5 अगस्त को पुलिस की केस डायरी में जलील अख्तर की उम्र और जन्म वर्ष समेत कई विवरण दर्ज थे। इसमें उनके 1982 से आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध होने की बात भी सामने आई।

हालांकि पुलिस का कहना है कि उन्हें 1982 से पहले का रिकॉर्ड नहीं मिला और जलील अख्तर अपने पिता से संबंध स्थापित करने वाला दस्तावेज़ पेश नहीं कर सके।

यहीं से नागरिकता साबित करने की प्रक्रिया को लेकर एक अहम सवाल खड़ा होता है—क्या दशकों पुराने दस्तावेज़ों और मतदाता सूचियों में मौजूद नाम के बावजूद किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए हिरासत में रखा जा सकता है कि उसके पास इससे भी पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं?

इस सवाल का अंतिम जवाब अदालत के फैसले से ही स्पष्ट होगा।

अदालत में दस्तावेज़ों को लेकर पुलिस की स्वीकारोक्ति

2 सितंबर की सुनवाई इस मामले में महत्वपूर्ण रही। ट्रांसक्रिप्ट के अनुसार, अदालत के दबाव में पुलिस ने लिखित रूप से स्वीकार किया कि जलील अख्तर के पास मौजूद वोटर आईडी, पैन कार्ड और अन्य दस्तावेज़ वास्तविक भारतीय दस्तावेज़ हैं।

इसके अलावा 1995, 2002 और 2026 की मतदाता संबंधी सूचियों में उनका नाम मौजूद होने की बात भी दर्ज हुई।

फिर भी उन्हें उस दिन जमानत नहीं मिली।

पुलिस का पक्ष यह है कि उसने जलील अख्तर को अदालत के सामने पेश कर दिया है और अब यह अदालत को तय करना है कि वह भारतीय नागरिक हैं या बांग्लादेशी।

परिवार का आरोप—बांग्लादेश भेजने की कोशिश

जलील अख्तर के परिवार का आरोप है कि पुलिस ने उन्हें कई बार बांग्लादेश भेजने की कोशिश की।

परिवार के लिए यह सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं है। उनका कहना है कि जलील अख्तर की उम्र 66 वर्ष है और उनके पास भारत में लंबे समय से रहने और मतदाता के रूप में दर्ज होने के प्रमाण मौजूद हैं।

परिवार ने हिरासत के दौरान उनसे मिलने की भी कोशिश की। ट्रांसक्रिप्ट के इस हिस्से में जलील अख्तर के भाई की बात आगे पूरी तरह दर्ज नहीं हो पाती, इसलिए उनके कथन का शेष हिस्सा यहां नहीं जोड़ा गया है।

सवाल सिर्फ जलील अख्तर का नहीं

जलील अख्तर का मामला एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—नागरिकता और मतदाता पहचान के पुराने रिकॉर्ड किसी व्यक्ति के खिलाफ संदेह पैदा करने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं या उसकी भारतीय पहचान के प्रमाण के रूप में भी देखे जाने चाहिए?

एक ओर पुलिस का आरोप है कि जलील अख्तर बांग्लादेश से भारत आए थे। दूसरी ओर 1995 की मतदाता सूची में उनका नाम होने का दावा, 2002 और 2026 के रिकॉर्ड में उनकी मौजूदगी और उनके पास मौजूद भारतीय दस्तावेज़ इस दावे पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

अब अदालत को यह तय करना है कि इन दस्तावेज़ों और पुलिस के आरोपों के बीच तथ्यात्मक स्थिति क्या है।

फिलहाल 66 वर्षीय जलील अख्तर हिरासत में हैं और उनका परिवार उनकी रिहाई तथा भारतीय नागरिक होने की पहचान को अदालत में साबित करने की लड़ाई लड़ रहा है।

यह मामला एक बुनियादी सवाल छोड़ता है: अगर किसी व्यक्ति की पहचान और उसके दशकों पुराने दस्तावेज़ मौजूद हैं, तो उसे अपनी नागरिकता साबित करने के लिए और कितनी पुरानी पहचान चाहिए?

मुकुल सरल

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