September 8, 2026 10:23 am
Home » गुफ़्तगू » ‘अच्छा मुस्लिम है तू, फिर तो चार डंडे और मारूंगी’

‘अच्छा मुस्लिम है तू, फिर तो चार डंडे और मारूंगी’

4PM की पत्रकार शाहीन खान और नफीसा खान ने दिल्ली पुलिस पर मारपीट, धमकी और मुस्लिम पहचान के आधार पर कथित दुर्व्यवहार के गंभीर आरोप लगाए हैं।

दिल्ली पुलिस पर दो महिला पत्रकारों का गंभीर आरोप

रेखा गुप्ता से सवाल पूछने के दौरान हिरासत में लिए जाने के बाद 4PM न्यूज़ नेटवर्क की पत्रकार शाहीन खान और नफीसा खान ने दिल्ली पुलिस पर मारपीट, गाली-गलौज, धमकी और धार्मिक पहचान के आधार पर कथित भेदभाव का आरोप लगाया है। दोनों पत्रकारों ने बेबाक भाषा से विशेष बातचीत में अपने साथ हुई घटना का सिलसिलेवार ब्यौरा साझा किया।

दिल्ली में पत्रकारिता, पुलिस की कार्रवाई और धार्मिक पहचान को लेकर गंभीर सवाल खड़े करने वाला एक मामला सामने आया है। 4PM न्यूज़ नेटवर्क की दो युवा महिला पत्रकारों—शाहीन खान और नफीसा खान—ने आरोप लगाया है कि दिल्ली की एक पुलिस चौकी/थाने में उनके साथ मारपीट और दुर्व्यवहार किया गया। दोनों का दावा है कि पुलिस की कार्रवाई केवल पत्रकार के तौर पर उनके सवाल पूछने तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनकी मुस्लिम पहचान सामने आने के बाद कथित तौर पर उनके साथ और अधिक बर्बर व्यवहार किया गया।

बेबाक भाषा से हुई विशेष बातचीत में दोनों पत्रकारों ने उस पूरे घटनाक्रम को याद किया और बताया कि किस तरह वे मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से सवाल पूछने के लिए मौके पर मौजूद थीं, उन्हें हिरासत में लिया गया और बाद में पुलिस स्टेशन में कथित तौर पर उनके साथ मारपीट की गई।

शाहीन खान के मुताबिक, वह करीब पांच वर्षों से पत्रकारिता कर रही हैं और लगभग तीन वर्षों से 4PM न्यूज़ नेटवर्क के साथ काम कर रही हैं। उनका कहना है कि पत्रकारिता के दौरान इससे पहले भी उन्हें उनकी पहचान को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियों और धमकियों का सामना करना पड़ा है।

रेखा गुप्ता से सवाल पूछने के बाद हिरासत में लेने का आरोप

शाहीन खान ने बताया कि वह मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के कार्यक्रम/पोस्टर के सामने खड़े होकर वीडियो बना रही थीं और पत्रकार के तौर पर सवाल पूछ रही थीं। उनके मुताबिक, इसके कुछ ही समय बाद उन्हें और उनके साथ मौजूद लोगों को हिरासत में लिया गया।

शाहीन का कहना है कि उन्हें लगभग रात 12 बजे के आसपास हिरासत में लिया गया था। उन्होंने बताया कि घटना से कुछ मिनट पहले ही उन्होंने बाहर से एक वीडियो बनाया था, जिसमें वह पूरे घटनाक्रम को रिकॉर्ड कर रही थीं।

उनके मुताबिक, वीडियो बनाने और पुलिस की कार्रवाई के बीच बहुत लंबा अंतर नहीं था।

‘पहले पत्रकार और महिला के तौर पर पीटा, फिर मुस्लिम पहचान पूछकर…’

शाहीन खान ने आरोप लगाया कि पुलिस स्टेशन में मौजूद महिला पुलिसकर्मी ने उनके साथ काफी देर तक मारपीट की। उनके मुताबिक, उन्हें लाठी से मारा गया और बाल भी खींचे गए।

लेकिन शाहीन के आरोपों में सबसे गंभीर बात वह क्षण है, जब उनके मुताबिक एक महिला पुलिसकर्मी ने उनके फोन पर आए कॉलर के नाम को देखा।

शाहीन का दावा है कि महिला पुलिसकर्मी ने फोन पर दिख रहे नाम को पढ़कर उनकी धार्मिक पहचान के बारे में टिप्पणी की और कथित तौर पर कहा—

“अच्छा मुस्लिम है तू, फिर तो चार डंडे और मारूंगी।”

शाहीन के मुताबिक इसके बाद महिला पुलिसकर्मी ने उन्हें थप्पड़ मारने और सहयोगी कॉन्स्टेबल को डंडे बरसाने के लिए कहा।

यह आरोप इस पूरे मामले को केवल पुलिस और पत्रकार के बीच टकराव से आगे ले जाता है और धार्मिक पहचान के आधार पर कथित भेदभाव और हिंसा के गंभीर सवाल खड़े करता है।

‘मैं मुस्लिम महिला पत्रकार हूं, क्या यही मेरा गुनाह है?’

नफीसा खान ने भी अपने इंटरव्यू में इसी सवाल को बेहद भावुक तरीके से उठाया।

उन्होंने कहा कि घटना के बाद उन्हें मानसिक तनाव से गुजरना पड़ा है। उनके शब्दों में सवाल था—

“क्या मेरा गुनाह ये है कि मैं भारतीय मुस्लिम महिला पत्रकार हूं?”

नफीसा ने आरोप लगाया कि उन्हें और शाहीन को पहले पुलिस स्टेशन में रखा गया और वहां मौजूद पुलिस अधिकारियों के रवैये ने उन्हें भयभीत कर दिया।

उनके मुताबिक, थाने के SHO वहां मौजूद थे और कथित तौर पर मुस्कुरा रहे थे तथा उन्हें धमका रहे थे। नफीसा ने बताया कि उस समय उनके माता-पिता दिल्ली से काफी दूर थे और वह अपने परिवार को फोन कर यह तक नहीं बता पा रही थीं कि उनके साथ क्या हो रहा है।

‘हैकड़ी निकालते हैं, बहुत पत्रकारिता बन रहे हो’

नफीसा के मुताबिक, SHO ने उन्हें कथित तौर पर धमकाते हुए कहा कि उनकी “हैकड़ी निकालते हैं” और उन्हें लॉकअप में बंद करने की बात कही।

उनका आरोप है कि पुलिस अधिकारी ने अलग-अलग धाराओं में मुकदमा दर्ज करने की धमकी भी दी।

इसके बाद, नफीसा के मुताबिक, SHO अपने कमरे में चले गए और कुछ ही देर बाद एक महिला पुलिसकर्मी, जिसे उन्होंने ‘सोनम’ के नाम से पहचाना, वहां आईं।

नफीसा का आरोप है कि उस महिला पुलिसकर्मी ने उनका फोन छीन लिया और उनके साथ मारपीट शुरू कर दी।

उन्होंने बताया कि महिला पुलिसकर्मी ने पहले थप्पड़ मारे और फिर उन्हें ऊपर एक कमरे में ले जाने के लिए कहा गया।

नफीसा का आरोप है कि उन्हें बाल पकड़कर घसीटा गया, पेट में लात मारी गई और ऊपर कमरे में ले जाकर भी पीटा गया।

उनके मुताबिक, वहां उनसे कहा गया कि पत्रकार बनकर सवाल पूछोगी और वीडियो बनाओगी, तो तुम्हें बताया जाएगा कि वीडियो कैसे बनाया जाता है।

‘धर्म पूछकर पीटा गया’

नफीसा का आरोप है कि ऊपर कमरे में ले जाने के बाद भी उनके साथ मारपीट जारी रही। उनका कहना है कि उस दौरान पुलिसकर्मियों ने गाली-गलौज और धमकी दी।

उनका दावा है कि पुलिस स्टेशन के भीतर लगातार चीख-पुकार और धमकियों का माहौल था।

शाहीन खान के बयान के मुताबिक भी मुस्लिम पहचान का संदर्भ मारपीट के एक चरण के बाद सामने आया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके अनुसार पहले उन्हें एक महिला और पत्रकार के तौर पर पीटा गया और बाद में उनकी धार्मिक पहचान को लेकर कथित टिप्पणी की गई।

यही बात दोनों इंटरव्यू के बीच एक महत्वपूर्ण समानता सामने लाती है—दोनों पत्रकारों के मुताबिक पुलिस स्टेशन में उनके साथ व्यवहार केवल उनकी पत्रकारिता से जुड़ा विवाद नहीं था, बल्कि उनके अनुसार इसमें उनकी पहचान को लेकर भी आपत्तिजनक रवैया शामिल था।

‘महिला पुलिसकर्मी से सुरक्षा की उम्मीद थी’

शाहीन खान ने कहा कि पुलिस में काम करने वाली महिला से उनकी अपेक्षा थी कि वह दूसरी महिला को सुरक्षित महसूस कराएगी और उसकी मदद करेगी।

लेकिन उनके मुताबिक, इसके उलट महिला पुलिसकर्मी ने उनके साथ कथित तौर पर हिंसक व्यवहार किया।

शाहीन ने बताया कि घटना के दौरान उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई और एक समय वह बेहोश हो गईं।

उन्होंने कहा कि उन्होंने उससे पहले अपने चैनल के माध्यम से यह बताना जरूरी समझा कि जिस पुलिस स्टेशन में वह मौजूद हैं, वहां एक महिला पत्रकार खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रही है।

‘मैं बेहोश हो गई थी’

शाहीन के मुताबिक, घटना के बाद उनकी तबीयत बिगड़ी और वह बेहोश हो गईं।

उन्होंने बताया कि पुलिस स्टेशन में कथित मारपीट के दौरान उनके बालों का एक बड़ा गुच्छा भी टूट गया था।

शाहीन ने अपने अनुभव को याद करते हुए कहा कि वह पहले भी पुलिस की कथित बर्बरता के बारे में सुनती रही थीं, लेकिन इस बार उन्होंने खुद इसे अनुभव किया।

उनके मुताबिक, यही वजह है कि उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को सामने लाने का फैसला किया।

मदद मांगने पर भी कथित तौर पर नहीं मिली सुरक्षा

शाहीन खान ने बताया कि जब पुलिस स्टेशन के कमरे का दरवाजा कुछ देर के लिए खुला तो उन्होंने बाहर मौजूद एक पुलिस अधिकारी से मदद की गुहार लगाई।

उनके मुताबिक, बाद में उन्हें पता चला कि वह अधिकारी ACP स्तर के अधिकारी थे।

शाहीन का कहना है कि उन्होंने ACP समेत थाने में मौजूद वरिष्ठ अधिकारियों और अन्य पुलिसकर्मियों के सामने मदद की गुहार लगाई, लेकिन उनके मुताबिक उन्हें तत्काल सुरक्षा नहीं मिली।

उनका कहना है कि यह सवाल और गंभीर हो जाता है क्योंकि एक पुलिस स्टेशन में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मौजूद थे और इसके बावजूद वह खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रही थीं।

FIR को लेकर भी उठाए सवाल

दोनों पत्रकारों ने अपने इंटरव्यू में FIR और पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाए।

शाहीन ने कहा कि घटना के बाद उनकी ओर से शिकायत और मेडिकल प्रक्रिया की गई, लेकिन बातचीत के समय तक किसी पुलिस अधिकारी ने उन्हें FIR की स्थिति को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं दी थी।

नफीसा ने भी कहा कि अगर पुलिस का मूल उद्देश्य “शांति, सेवा और सुरक्षा” है, तो पुलिस स्टेशन के अंदर मौजूद दो महिला पत्रकारों की सुरक्षा क्यों सुनिश्चित नहीं की गई?

यह सवाल अब जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है कि शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई, मेडिकल रिपोर्ट में क्या दर्ज है, संबंधित पुलिसकर्मियों की पहचान क्या है और क्या किसी अधिकारी के खिलाफ विभागीय या आपराधिक कार्रवाई शुरू की गई है।

‘गृह मंत्री अमित शाह से भरोसा नहीं’

दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में आती है। ऐसे में दोनों पत्रकारों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी सवाल किया।

शाहीन खान ने कहा कि दिल्ली पुलिस की कार्यशैली को लेकर पहले भी कई सवाल उठे हैं। उन्होंने जंतर-मंतर पर पुलिस कार्रवाई का संदर्भ देते हुए कहा कि पहले वह सोचती थीं कि पुलिसकर्मी इतने बेरहम कैसे हो सकते हैं, लेकिन अब उन्होंने खुद उस अनुभव को झेला है।

उन्होंने कहा कि उन्हें गृह मंत्री से भरोसा नहीं है, लेकिन कानून और न्यायपालिका में उनका विश्वास कायम है।

शाहीन ने कहा कि अगर पहले की घटनाओं में शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई होती, जिम्मेदारी तय की जाती और माफी मांगी जाती, तो शायद पुलिसकर्मियों का मनोबल इतना नहीं बढ़ता कि ऐसी घटना दोबारा सामने आती।

नफीसा का सवाल—‘इस मुल्क में हो क्या रहा है?’

नफीसा खान ने अपने इंटरव्यू में कहा कि घटना ने उन्हें मानसिक तनाव दिया है।

उनका सवाल था कि आखिर इस देश में क्या हो रहा है, जहां किसी व्यक्ति की पहचान उसके कपड़ों, नाम या धर्म से की जाए और उसके आधार पर उसके साथ मारपीट की जाए।

उन्होंने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि जिन लोगों पर मारपीट और दुर्व्यवहार के आरोप हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।

उनका कहना है कि वह चाहती हैं कि इस मामले में इंसाफ मिले और दोषी पाए जाने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।

‘नाम खान है’—पत्रकारिता और पहचान के बीच खड़ी एक महिला

इस पूरे घटनाक्रम में शाहीन खान की एक बात विशेष रूप से ध्यान खींचती है।

इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि जब पत्रकार के तौर पर उनसे उनकी पहचान जुड़ी, तब उन्होंने अपने नाम ‘शाहीन खान’ को छिपाने की कोशिश नहीं की।

उनके लिए यह सिर्फ एक व्यक्तिगत पहचान नहीं बल्कि उस समय पत्रकारिता की स्वतंत्रता और अपने अधिकार के सवाल से भी जुड़ गया।

उनका कहना है कि वह लगातार सवाल पूछने वाले एक मीडिया संस्थान से जुड़ी हैं और पत्रकार के तौर पर सवाल पूछना उनका काम है।

यही वजह है कि वह इस घटना को केवल व्यक्तिगत उत्पीड़न के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि इसे पत्रकारों की सुरक्षा, महिला सुरक्षा और धार्मिक पहचान के आधार पर भेदभाव के बड़े सवाल से जोड़ती हैं।

अब आगे क्या?

शाहीन खान और नफीसा खान के आरोप बेहद गंभीर हैं। लेकिन इन आरोपों की स्वतंत्र जांच, पुलिस रिकॉर्ड, CCTV फुटेज, मेडिकल रिपोर्ट, शिकायत/FIR और संबंधित पुलिसकर्मियों के बयान इस पूरे मामले की सच्चाई स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण होंगे।

इस मामले में कई सवालों के जवाब अभी सामने आना बाकी हैं—

  • क्या दोनों पत्रकारों की शिकायत पर FIR दर्ज हुई?
  • मेडिकल रिपोर्ट में क्या दर्ज है?
  • थाने में लगे CCTV कैमरों में क्या रिकॉर्ड हुआ?
  • घटना के समय कौन-कौन से पुलिस अधिकारी और महिला पुलिसकर्मी वहां मौजूद थे?
  • क्या आरोपों की विभागीय जांच शुरू हुई?
  • क्या संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई?
  • और सबसे अहम—क्या किसी पत्रकार को उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाया गया?

इन सवालों के जवाब सिर्फ शाहीन और नफीसा के लिए नहीं, बल्कि पत्रकारों की सुरक्षा, पुलिस की जवाबदेही और संविधान में मिले समानता एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हैं।

फिलहाल दोनों पत्रकारों का कहना है कि उनकी लड़ाई जारी रहेगी। उनका भरोसा न्यायपालिका और कानून में है और वे इस मामले में न्याय की मांग कर रही हैं।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

Read more
View all posts

ताजा खबर